एक दिशा से, और एक दिशा से क्या, अनेकों दिशा से संसार अब तेरे भीतर पुनः विकृत रूप में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा है। माया अपना आकर्षक नाच फिर शुरू कर रही है और ये सब दिखने में बड़ा मधुर लगेगा। दिखने में बड़ा चित्त आकर्षक लगेगा। बादल आए हैं, हल्की रिम-झूम फुहार है। “ऐसा हो सकता है अवधूत कि, तू भी बहक जाए। तो कहते हैं कि “उठो ज्ञानी खेत संभारो, बह निसरेगा पानी।”-इस समय पर यदि तूने अपने मन की देख भाल नहीं की, तो जो कुछ भी तूने जाना है, अर्जित किया है, वो सब खतरे में पड़ जाएगा। तू फिर उसी माया के शिकंजे में आ जाएगा, जिससे आज़ाद हो करके तू अवधूत हुआ था। “निरत सुरत के बेल बनावो”, “निरत” माने निवृत्ति। निवृत्ति मतलब छोड़ दिया, छूट गए। “सुरत” मतलब सुरति। सुरति मतलब याद करना। लगातार उसी के साथ रहना। “निरत सुरत के बेल बनाओ।” बेल माने रस्सी। इनकी रस्सियाँ बनाओ। इन रस्सियों से जो तुम्हारा खेत है, जो तुम्हारा मन है, इसकी बाड़ तैयार की जाएगी। बाड़ को बाँधने के लिए इन रस्सियों का इस्तेमाल करेंगे, निरत और सुरत की। “निरत सूरत के बेल बनावो, बीजा बो निज धानी।”- और इसमें जो बीज डाले, तुम्हारे खेत में, वो एक ही रहे। तुम्हारी समझ का, तुम्हारे जानने का, तुम्हारे ध्यान का बीज रहे। सन्देश जा रहा है कबीर का कि –अवधूत, बादल छा चुके हैं, वर्षा होगी, तूने लाख बार ये लड़ाई जीती हो, लेकिन इस बार भी तुझे अपने खेत की रक्षा करनी ही पड़ेगी।