
लड़का पच्चीस साल का, तीस साल का है और कुल एक भाई एक बहन है। अकसर माँ-बाप कार्यरत रहे थे, दोनों ही कमाते थे तो बचत है घर में। मकान अपना है। लड़का अगर पच्चीस-तीस साल का है तो माँ-बाप कितने साल के हैं?
साठ-पैंसठ।
अभी-अभी रिटायर (सेवानिवृत) हुए हैं,…

नौ बजे खाना लगना है मेज़ पर, सात बजे से सूँघना शुरू कर देते हैं।
“तो आज क्या बन रहा है? तो आज क्या बन रहा है?”
जब ज़िंदगी बिलकुल बैरोनक और खाली होती है तो दिमाग में सिर्फ़ खाना और थाली होती है।

जिनके दिल नहीं टूटते उनके लिए जीवन में कोई प्रगति संभव नहीं है। जो अपनी असफलता को भी चुटकुला बनाए घूमते हैं, जिन्हें लाज ही नहीं आती, उनके लिए जीवन में कोई उन्नति, उत्थान संभव नहीं है।
इंसान ऐसा चाहिए जो लक्ष्य ऊँचा बनाए। और लक्ष्य फिर ना मिले तो…

कुछ साल मिले हैं जगने के लिए, उसके बाद तो खूब सोना है। तो यह तुम कैसे आदत अभी पाले हुए हो कि, “ज़रा और सो लें एक घण्टा, दो घण्टा”?
भीतर एक चेतना होनी चाहिए, लगातार एक गूंज होनी चाहिए कि, “लंबे पाँव पसार कर के अनंत समय के…

लड़के यहाँ आते हैं – लड़के भी क्यों कहूँ – युवा, मर्द पच्चीस-पच्चीस, तीस-तीस साल के। वो कहते हैं, “घर वालों के कारण घर पर पड़ा हुआ हूँ, कोई काम नहीं करता और घर का माहौल कुछ ऐसा है कि काम करने की प्रेरणा नहीं मिलती।“ सारा दोष घर वालों…

आलस के मज़े होते हैं। आलस से ज़्यादा मज़ेदार कुछ मिला ही नहीं अभी तक!
बहुत मोटे-मोटे बच्चे देखे हैं मैंने, तीन साल, चार साल की उम्र तक घर पर पड़े थे एकदम मोटे, उनका स्कूल में दाखिला होता है वह तुरंत पतले हो जाते हैं। दोस्त-यार मिल गए, खेल…

तुमको आलस प्यारा है तो कर लो आलस, बस यह झूठ मत बोल देना कि आलस ने तुम्हें विवश कर दिया, कि आलस ने तुम्हें पकड़ लिया। आलस ने तुम्हें नहीं पकड़ लिया, तुमने आलस को पकड़ा है। कोई विवशता नहीं है, आलस तुम्हारा चुनाव है। हर बात में तो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब सब पता चलता है, सब दिखता भी है कि सब ठीक नहीं चल रहा उसके बावजूद भी कुछ बदलता क्यों नहीं है?
आचार्य प्रशांत: आप जो बात बोल रहे हैं न, वो जीवन के मूल सिद्धांत के ख़िलाफ़ है। जीवेषणा समझते हैं क्या होती है? और…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार गुरुजी, मुझे ये बोलना है कि मुझे काफ़ी हिम्मत की कमी महसूस होती है। उस कारण से कोई निर्णय भी स्पष्टता से नहीं ले पाता हूँ, न कुछ पूरी तरह हाँ होता है और न कुछ पूरी तरह ना होता है। मुझमें कोई स्पष्टता नहीं आ पाता। कृपया…

प्रश्न: आचार्य जी, आज दिन भर तमस हावी रहा है। मैं देख रहा था कि उसपर मेरा वश चल नहीं पा रहा था ज़्यादा। कभी देख पा रहा था, कभी लुढ़क रहा था, और कभी उठा रहा था ख़ुद को। ये लगातार चलने वाली प्रक्रिया है या कुछ और है?…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आजकल कुछ भी मन नहीं करता करने क — न धन के लिए, न ध्यान के लिए। आलस से भरा रहता हूँ। कुछ कहें।
आचार्य प्रशांत: कौन कह रहा है कि मन कुछ भी करने का नहीं करता? आलस करने का नहीं करता? मन यदि कुछ नहीं…

प्रश्न: आचार्य जी, किसी भी काम में मन नहीं लगता। आलस बना रहता है। इस आलस से छुटकारा कैसे पाएँ?
आचार्य प्रशांत जी: आलस से ज़्यादा सुन्दर कुछ मिला नहीं। आलस के मज़े होते हैं। आलस से ज़्यादा मज़ेदार कुछ मिला ही नहीं अभी तक।

प्रश्न: आचार्य जी, बीस साल से जिन ढर्रों पर चलता आ रहा था, आपने आकर बोल दिया कि वो ठीक नहीं हैं। तो अब मैं उन्हें ठीक करने की कोशिश करूँगा। दो-चार दिन चलूँगा, फिर पाँचवें दिन लगेगा सब ऐसे ही चल रहे हैं तो ठीक है रहने दो, मैं…

आचार्य प्रशांत: कॉलेज, घर, दोस्त, माता-पिता, शिक्षक, शॉपिंग मॉल; तुम्हारा संसार यही है, इतना ही है। यही है न?
कोई और होगा जिससे मैं पूछूँ, “संसार माने क्या?,” वो शायद बोलेगा, ‘*लेबोरेटरी*‘(प्रयोगशाला)। यह उसका संसार है। अगर कोई प्रेम में है और मैं उससे पूछूँ, “संसार क्या है?,” वो कहेगा,…

आचार्य प्रशांत: क्या है आलस्य?
हम चीज़ों को, उनके लक्षणों के आधार पर भ्रमित कर लेते हैं। हम चीज़ को उसके नाम से भ्रमित कर लेते हैं। अच्छा, दाल क्या है? दाल का नाम है दाल? क्या दाल का नाम है दाल?

‘ईश्वर खींच लेता है जीवों को उनकी मृत्यु के समय, और जिन्हें मृत्यु नहीं आयी उन्हें निद्रा की स्थिति में खींच लेता है। फिर जिन की मृत्यु निश्चित हो चुकी होती है, उन्हें रोक लेता है और शेष को विदा कर देता है, एक निश्चित अवधि…

श्रोता : सर, अभी आपने बात की थी कि आलस बिल्कुल नहीं होना चाहिए| तो उस पर थोड़ा और बता देंगे कि आलस को अहंकार किस तरह से इस्तेमाल करता है?
वक्ता : आलस बड़ी चालाक चीज़ होती है | कोई भी फ़िज़ूल काम करने में तुम्हें कभी आलस नहीं…

प्रश्न: ऐसा बहुत बार होता है कि सत्य की झलक मिलती है। पर हम झलक मिलने के बाद भी क्यों अनजान बने रहते हैं?
वक्ता: जिस क्षण में तुम्हें झलक मिलती है, उस क्षण में तुम कुछ भी नज़रंदाज़ नहीं कर रहे होते हो। सत्य की झलक मिलने के बाद…

प्रश्न: सर टाल-मटोल की आदत से कैसे बचें?
वक्ता: क्या तुम इस सवाल को टाल रहे हो अभी? अभी ये सवाल पूछ रहे हो। तुम चाहते तो इसे टाल सकते थे कि ‘कौन पूछे? यहाँ इतने लोग बैठे हैं सभी थोड़े ही सवाल पूछ रहे हैं’, तुमने पूछा…

वक्ता: सूरज का निकलना रात की मौत है, तो क्या सूरज नहीं निकले?
रोशनी का आना, अँधेरे की मौत है। तो क्या रोशनी न आये? दवाई का खाना, बैक्टीरिया और वायरस की मौत है। तो क्या दवाई न खाई जाये? जवानी का आना, बचपन की मौत है। तो क्या जवानी…



पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”




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कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।
प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।
जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है, वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९
प्रश्नकर्ता: जब…

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\n\n29 अप्रैल से 1 मई, 2022 तक आयोजित हुए वेदांत महोत्सव के एक प्रतिभागी की प्रेरणास्पद कहानी\n\nमेरा नाम राकेश कुमार है। मैं कानपुर नगर से हूँ। पिछले चार माह से मैं हर…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। आज का सबसे पहला प्रश्न जो है वह सनातन के ऊपर है कि सनातन माने क्या? और ऐसा क्या है जिसको वास्तविक रूप में सनातन कहा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सनातन का अर्थ होता है वो जो काल की सीमाओं से के बाहर का हो।…

भारतीयों को शायद यह लगता है कि हिंदुस्तान से बाहर जहाँ कहीं कोई मिलेगा वह ‘अंग्रेज़ी’ ही बोल रहा होगा। एक तो यह बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है – बाहर जैसे ही हम निकलेंगे वैसे ही जो मिल रहा होगा अंग्रेज़ी ही बोल रहा होगा। हिंदुस्तान बेचारा बस पिछड़ा हुआ है,…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अर्जुन कहते हैं कृष्ण से कि ‘धृतराष्ट्र पुत्र चाहे मुझे मार भी दें तो भी उनसे लड़ना तो ग़लत ही है।‘ हमारे आम जीवन में भी ऐसे ही चलता रहता है कि हम इमोशनल ब्लैकमेल (भावनाओं से किसी को नियंत्रित करना) करते हैं बहुत बार, या…

प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपने एक उदाहरण दिया था, एम एच ३७० का, कि हम जो खोज रहे हैं वो हमें कहीं मिल नहीं रहा इसलिए यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) इतना बड़ा है कि लगातार हम खोजते जा रहे हैं। तो स्पेस (स्थान) की तो बात उससे समझ में आ रही है।…

प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी…

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०
आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के…

आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क…

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
"तो कुल क्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ३९
आचार्य प्रशांत: इसी आशय के तर्क आगे भी…

आचार्य प्रशांत: देखिए, बात को समझिए। गीता, सांख्ययोग में, शुरू के कुछ श्लोकों के बाद से भी आरम्भ हो सकती थी। पहला अध्याय तो पूरा ही अर्जुन के विषाद का निरूपण है और दूसरे अध्याय के भी कुछ आरंभिक श्लोकों में अर्जुन की ही व्यथा है। कृष्ण की ज्ञानवर्षा तदोपरांत…

आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, प्रथम अध्याय, अर्जुन विषाद योग। देखेंगे कि श्रीकृष्ण अर्जुन के सब भावुक, मार्मिक वक्तव्यों को किस प्रकाश में देख रहे हैं। तो अपनी ही मोहजनित पीड़ा को आगे अभिव्यक्त करते हुए अर्जुन कहते हैं:
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: |
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥
यद्यपि ये…

प्रश्नकर्ता: आपकी जो बाकी शिक्षाएँ हैं वो भी मुझे बिलकुल गीता से मिलती हुई लग रही हैं। आप जैसे पहले कहते थे कि हृदय में शिव और भुजाओं में शक्ति। तो अभी आप बोले कि हृदय कोमल होना चाहिए और बलिष्ठ भुजाएँ होनी चाहिए तो बिलकुल वो बातें एक जैसी…

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्। कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥27॥
अर्जुन उवाच।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥28॥
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥29॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चै व परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥30॥
“जब कुन्तिपुत्र अर्जुन ने अपने बंधु बान्धवों को वहाँ…

यावदेतानिरीक्षेऽहं योद्धकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥22॥
“मैं इन सब युद्ध करने की कामनाओं से अवस्थित योद्धाओं को देखूँ कि किन वीरों के साथ मुझे युद्ध करना होगा।”
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक २२, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग
आचार्य प्रशांत: क्या जानते नहीं हैं अर्जुन कि किनके साथ युद्ध करना होगा?…

आचार्य प्रशांत: हम सबके भीतर, हम कितना भी छुपा लें, पर होता है कोई जो सत्य को छोड़ नहीं सकता। हम स्वयं को कितना भी भ्रम में रख लें, एक तल पर सच्चाई हम सबको पता होती है। वास्तव में अगर सच्चाई पता ना हो तो स्वयं को भ्रम में…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं ईशावास्य उपनिषद् पढ़ रहा था जिसमें नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ श्लोक था विद्या और अविद्या पर। तो उसमें यह लिखा था कि अविद्या इज़ ऑब्जेक्टिव नॉलेज एंड विद्या इज़ अविद्या विद सेल्फ नॉलेज (अविद्या भौतिक ज्ञान है और विद्या भौतिक ज्ञान के साथ-साथ आत्म-ज्ञान है)।
तो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले किसी सत्संग में जाती थी, वहाँ पर कुछ बातें बतायी जाती थीं। अष्टावक्र गीता पर आपने बताया कि आज यहाँ पर उसकी उपयोगिता नहीं है। और अष्टावक्र जी ने जैसे बताया है कि ब्रह्म-ही-ब्रह्म है, आत्मा-ही-आत्मा है। तो अभी कुछ दिन पहले मैं अपने…

आचार्य प्रशांत: इन सैकड़ों श्लोकों की यात्रा करेंगे हम। इस यात्रा में ये सोच कर आगे नहीं बढ़िएगा कि आप पहले से कुछ भी जानते हैं। हर जगह रुकिए और पूछिए — ये क्या हो रहा है? उसको आदत-सा बना लीजिए, अभ्यास करिए।
जो अभ्यास आपका बाहर की तरफ़ रहता…

आचार्य प्रशांत: पहले ही अध्याय में, अच्छे से देखिए, दो हैं जो परेशान हैं। कौन? रणक्षेत्र में दो हैं जिनकी चिंता पहले ही अध्याय में हमारे सामने आ जाती है — दुर्योधन और अर्जुन।
इस बात को अच्छे से पकड़िए। चिन्ताग्रस्त होना बुरा नहीं है; दुर्योधन वाली चिंता रखना बुरा…

सञ्जय उवाच।
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रतीत् ॥२॥
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्। व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥
अस्माकं तु…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। बहुत बहुत धन्यवाद। आपके कोर्सेज़ को मैं यूट्यूब पर भी सुने हैं। कुछ मैंने ऑनलाइन सत्र भी अटेंड किए है।
मेरा जो प्रश्न है वो ये है कि मेरा मोटिवेशन लेवल बहुत फ्ल्कचुएट(ऊपर-नीचे) होता है। दिन में ही कई बार बहुत डिप (नीचे) में भी…

संघर्ष में हम सभी हैं; ज़िंदगी युद्ध तो है ही। दूसरे को क्या दिखाना चाहते हो? अपनी चोट, अपनी हार या अपना हौसला? अपना हौसला दिखाओ न दूसरे को!
बचना ऐसे लोगों से जो बार-बार तुम्हें अपनी चोट और अपने घाव दिखाते हों। उसके पास जाना जिसके पास चोट भी…