गीता उपनिषदों से ज़्यादा उपयोगी! || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले किसी सत्संग में जाती थी, वहाँ पर कुछ बातें बतायी जाती थीं। अष्टावक्र गीता पर आपने बताया कि आज यहाँ पर उसकी उपयोगिता नहीं है। और अष्टावक्र जी ने जैसे बताया है कि ब्रह्म-ही-ब्रह्म है, आत्मा-ही-आत्मा है। तो अभी कुछ दिन पहले मैं अपने एक रिश्तेदार के यहाँ गयी थी जो उसी तरह के सत्संग में जाते हैं। और उनके घर पर किसी कीड़े को ऐसे ही मार दिया गया।
तो आपसे जितना समझ आया है, वो मैंने उनको बताने का प्रयास किया और बताते हुए भी मैं आउट ऑफ कंट्रोल (आपे से बाहर) हो गयी, थोड़ा नाराज़ भी हो गयी। मुझे ये समझ नहीं आता कि वो लोग एक ओर कहते हैं, ब्रह्म-ही-ब्रह्म है और दूसरी ओर वो छोटे जीव-जंतुओं, मच्छर, मक्खी, चूहे आदि को इतनी हिंसा के साथ मार देते हैं और कहते हैं ‘इसकी तो मुक्ति हो गई, इसकी ये योनि यहीं पर ख़त्म हुई, अब ये ऊँची योनि में जन्म लेगा।‘
आचार्य प्रशांत: एक बेसबॉल बैट आप भी रखा करिए — मुक्ति-प्रदाता। ‘ये क्या है?’ ‘ये मुक्ति का उपकरण है। गुरु जी, आप से ज़्यादा तो कोई योग्य है ही नहीं मुक्ति के लिए। आपने इतनी गीताएँ पढ़ी हैं, आप ही कहते हो ब्रह्म-ही-ब्रह्म है। आपको तो कब की मुक्ति मिल जानी चाहिए थी। कृपया मुझे मौका दें।‘
मैं क्या बोलूँ?
प्र: मैं उत्तर नहीं दे पायी, मुझे गुस्सा बहुत जल्दी आ गया।
आचार्य: ऐसों को उत्तर चाहिए ही नहीं। (बेसबॉल के बैट का इशारा करते हुए)



