प्रश्नकर्ता: नमस्कार गुरुजी, मुझे ये बोलना है कि मुझे काफ़ी हिम्मत की कमी महसूस होती है। उस कारण से कोई निर्णय भी स्पष्टता से नहीं ले पाता हूँ, न कुछ पूरी तरह हाँ होता है और न कुछ पूरी तरह ना होता है। मुझमें कोई स्पष्टता नहीं आ पाता। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: ये सब अपने स्वरूप के प्रति अज्ञान के कारण ही होता है। जब तुम्हें पता ही नहीं कि तुम कौन हो, जीवन क्या है, जीना किसलिए है, तो तुममें क्या क्लैरिटी(स्पष्टता), क्या स्पष्टता आएगी! जो व्यक्ति कुछ समझता ही नहीं, वो तो किसी भी जगह पर स्पष्ट और सशक्त निर्णय ले ही नहीं पाएगा न। निर्णय लेता भी रहेगा तो डगमग-डगमग रहेगा।
तो ये न कहो निर्णय इत्यादि नहीं ले पाता, वो सब लक्षण हैं, बस। जो मूल व्याधि है वो दूसरी है। मूल व्याधि ये है कि पशु पैदा हुए थे और पूर्ण इंसान बनने की शिक्षा मिली नहीं; बहुत कम लोगों को मिलती है। आधा इंसान हमें बना कर छोड़ दिया गया है; या तो पूरा पशु ही रहने दिया जाता तो भी कोई दिक्कत नहीं थी। इंसान को जंगल में छोड़ दिया जाए — बच्चा पैदा हो उसे तुम जंगल में छोड़ दो, उसे किसी तरह की कोई मानसिक या आध्यत्मिक समस्या कभी उठेगी ही नहीं। वो मस्त रहेगा।
किसी पशु को देखा है कभी गहन विचार में, परेशान? कभी देखा है कि 'अरे! मेरा अपमान हो गया, मैं आत्महत्या कर लूँ।' कोई कुत्ता घूम रहा है मुँह लटकाए। 'क्या हुआ?' 'अरे नहीं! ये मेरे पिल्ले मेरी इज्ज़त नहीं करते।' ऐसा होता है क्या? होता है?
पशुओं को कोई समस्या नहीं है अस्तित्वगत तल पर। उनकी जो सारी समस्या है वो शरीर की है, बस। खाना नहीं मिला तो परेशान हो जाएगा इधर-उधर, या उसके क्षेत्र पर, टेरिटरी पर कोई दूसरा पशु आ गया तो कहेगा। "भाग यहाँ से!" लड़ाई हो जाएगी। पशुओं की समस्याएँ इतनी ही होती हैं। पशु मस्त जीता है, और जो मुक्त पुरुष है वो भी मस्त जीता है। उसे भी कोई समस्या नहीं होती। इसीलिए कहा गया है कि जो मुक्त पुरुष है वो एक मामले में पशु जैसा हो जाता है, तुम उसे परेशान नहीं पाओगे। वो पशुओं की तरह ही फिर निर्भीक स्वछंद घूमता है, उन्मुक्त बिलकुल, जैसे आज़ाद पंछी हो।

