कृष्ण ही अंतिम उपाय || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

आचार्य प्रशांत: इन सैकड़ों श्लोकों की यात्रा करेंगे हम। इस यात्रा में ये सोच कर आगे नहीं बढ़िएगा कि आप पहले से कुछ भी जानते हैं। हर जगह रुकिए और पूछिए — ये क्या हो रहा है? उसको आदत-सा बना लीजिए, अभ्यास करिए।
जो अभ्यास आपका बाहर की तरफ़ रहता है, वही भीतर की तरफ़ भी हो जाता है। बाहर यदि आप ऐसा स्वांग करेंगे जैसे ‘मुझे तो पहले से ही पता है’ तो भीतर की तरफ़ भी आपका यही रवैया हो जाएगा कि ‘स्वयं को तो मैं पहले से जानता हूँ’। एक-एक श्लोक पर वैसे ही रुकना है जैसे अपने एक-एक क्रियाकलाप और विचार पर। ‘ये क्या है?’ ‘मुझे मालूम नहीं। मैं एकदम ताज़ी शुरुआत करना चाहता हूँ, मैं पूछना चाहता हूँ, ये क्या किया तुमने? ये क्या सोच रहे हो? किस दिशा जा रहे हो?’ और जब ऐसे पूछेंगे तो कुछ नया सामने आएगा; लाभप्रद।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। जैसा कि आपने अभी बात करी कि ऊँचा दुःख और ऊँची लड़ाई। तो पहले मैं एक गृहणी थी तो गृहणी के रूप में शांत थी। अब व्यापार शुरू करने के बाद अपने-आपमें लोभ दिखता है, लालच, डर, ईर्ष्या; अब अपने में ही इतने सारे विकार दिखते हैं। अभी हाल ही में एक घटना हुई, व्यापार को लेकर, तो मैं तीन-चार रातों तक सो नहीं पायी। तो जैसे आपने बताया कि गहराई में जाने से ही समाधान मिलेगा लेकिन स्थितियाँ जैसे ही सामान्य होती हैं हम फिर से अपने ढर्रों पर आ जाते हैं; और गहराई और ऊँचाई की तरफ़ जाना ही भूल जाते हैं। तो ये कैसे हो पाएगा?
आचार्य: ये तो अर्जुन के साथ भी होता था। अगर अर्जुन लगातार गहरी चेतना में ही वास कर रहे होते तो गीता की ज़रूरत ही क्यों पड़ती? कृष्ण से यदा-कदा दूर हो जाते रहे होंगे, तभी तो मन में इतने तरह के संशय उठे। जो आपके साथ हो रहा है वो किसी के भी साथ होगा, जो कृष्ण से दूर हो जाएगा। अब एक ग़लती ये होती है कि कृष्ण से दूर हैं और दूसरी ग़लती ये होती है कि जब संशय उठे तो उसे ख़ुद ही निपटा दिया। कृष्ण-चेतना के अभाव में ही निपटा दिया।





