सही जिज्ञासा क्या? सही माँग कैसी? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं ईशावास्य उपनिषद् पढ़ रहा था जिसमें नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ श्लोक था विद्या और अविद्या पर। तो उसमें यह लिखा था कि अविद्या इज़ ऑब्जेक्टिव नॉलेज एंड विद्या इज़ अविद्या विद सेल्फ नॉलेज (अविद्या भौतिक ज्ञान है और विद्या भौतिक ज्ञान के साथ-साथ आत्म-ज्ञान है)।
तो जितना मैंने पढ़ा उससे ये समझ में आया कि विद्या और अविद्या दोनों को जानना ज़रूरी है। और अभी आप जब भगवद्गीता शुरू किए तब बोले कि सही जिज्ञासा करें। तो सही जिज्ञासा हो रही है यह कैसे पता चले कि क्या विद्या या अविद्या है, या जिज्ञासा सही है, इसको कैसे समझ सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: सही जिज्ञासा में ‘मैं’ शब्द हमेशा सम्मिलित रहता है। सही जिज्ञासा विद्या संबंधित होती है। उसमें दुनियादारी की बात हो सकती है, लेकिन ‘मैं’ फिर भी मौजूद रहेगा। हो सकता है आप कोई ऐसा सम्बन्ध पूछ रहे हों जो पूरा प्रश्न आपका सांसारिक ही हो, लेकिन फिर भी ‘मैं’ उसमें मौजूद रहेगा। आपको पता होगा कि आप ये बात क्यों जानना चाहते हैं।
‘रूस और यूक्रेन के बीच क्या हो रहा है?’ – ये एक प्रश्न है, और उससे कहीं बेहतर प्रश्न है, ‘रूस और यूक्रेन में क्या हो रहा है और उसका मुझसे क्या रिश्ता है और मेरी उसमें उत्सुकता क्यों है?’ – ये उससे ऊँचा प्रश्न है।
तो आपने जैसे कहा न ‘*विद्या इज़ अविद्या प्लस सेल्फ नॉलेज*।’ तो रूस यूक्रेन की बात तो पूछनी ही है, साथ-ही-साथ एक नज़र इस पर भी रखनी है कि ‘मेरा उससे क्या नाता है?’ नाता तो है ही, तभी आपने वो सवाल पूछा। वो नाता खोल कर रखना है।
और नहीं बोलूँगा मैं अब कुछ (हँसते हुए)। कुछ और हो पूछने को तो बताइए?



