और अगर बच्चे हों गर्भ में तो और क्या बात करेंगे, कहेंगे देखो, जिंदगी नौ महीने की होती है, और नौवें महीने के बाद हो जाती है मृत्यु। उनमें से एक कह रहा है कि देखो ऐसा नहीं है, ये जीवन तो ख़त्म हो जाता है पर उसके बाद एक दूसरा शुरू होता है। और दूसरा कह रहा है, नहीं, दूसरा कोई नया जीवन नहीं है। कहता है देखो, अभी हम हैं यहाँ पानी के अंदर लगातार, और ये पानी नहीं रहेगा तो जियेंगे कैसे? तो पहला कहता है कि देखो पानी नहीं रहेगा तो जीने के और सौ सहारे रहेंगे, तुम हवा में साँस ले सकते हो। तो दूसरा कहता है, हवा? हवा तो कुछ होती ही नहीं, पानी होता है। पहला कहता है, देखो हवा भी होती है और जब तुम बाहर रहोगे तो तुम्हारी देखभाल करने के लिए माँ भी होगी। तो दूसरे वाला कहता है, माँ, माँ क्या होती है, कहाँ है माँ? माँ जैसा कुछ नहीं होता। तो पहला कहता है, माँ जैसा कुछ होता है और हम सब लगातार माँ में ही स्थित हैं। माँ हम से बाहर नहीं है, हम माँ में ही हैं। तो दूसरा कहता है, कहाँ है माँ, दिखाओ? तो इस तरह वो समझाता ही रह जाता है पर दूसरा मानता ही नहीं कि मृत्यु (प्रसव) के बाद भी जीवन है।