प्रश्न: ऐसा बहुत बार होता है कि सत्य की झलक मिलती है। पर हम झलक मिलने के बाद भी क्यों अनजान बने रहते हैं?
वक्ता: जिस क्षण में तुम्हें झलक मिलती है, उस क्षण में तुम कुछ भी नज़रंदाज़ नहीं कर रहे होते हो। सत्य की झलक मिलने के बाद जो प्रक्रिया होती है उसका नाम ‘अज्ञान’ है ही नहीं। उसका नाम है, ‘दमन’। हम ‘उपेक्षा’ नहीं करते, हम ‘दमन’ करते हैं। हमें दमन इसलिए करना पड़ता है क्योंकि सच की झलक ये दिखा जाती है कि बाकी सब कितना झूठ है। सच की झलक खतरनाक होती है। वह तुम्हारे सामने सिर्फ दो ही विकल्प छोड़ती है:
पहला: जो दिख गया उसके अनुसार ज़िन्दगी जीयो।दूसरा: अपने झूठे तरीकों पर वापिस लौट जाओ।
अब ये तो निश्चित सी बात है कि जो दिख गया उसके अनुसार ज़िन्दगी जीयोगे तो जो बंधी-बंधाई प्रक्रिया चल रही थी ज़िन्दगी की, वह अव्यवस्थित हो जाएगी। उसे टूटना होगा। इसका टूटने का ख्याल भर ही बड़ा दर्द देता है क्योंकि जो टूटने जा रहा है उसी से हम जुड़े हैं, उसी से हमारी पहचान है। सच जिसको तोड़ देना चाहता है उसी से हमारा तादात्म्य है। उसके टूटने का विचार ही बड़ी पीड़ा देता है। इसलिए जैसे ही सच दिखाई देता है उसके कुछ ही क्षणों बाद आदमी जो देखा था, वो सब दबा देता है, कोशिश करता है कि भूल जाए। भूल सकता नहीं है, तो उसे दबा देता है। जब हमने रोहित से पूछा कि आज की चर्चा का विषय बताओ, तो रोहित ने कहा, ‘पानी’।
‘पानी’ का लाओ त्ज़ो ने बड़े गहरे अर्थों में प्रयोग किया है। बड़े ही गहरे अर्थों के साथ! उसने कहा है कि पानी एक ऐसी ताकत है जो प्रतिरोध भी नहीं देती है और फिर भी काट डालती है। यह पानी इन पत्थरों पर पड़ रहा है, इनका आकार कैसा हो गया है?
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