
प्रश्नकर्ता: शिवमय होना क्या है?
आचार्य प्रशांत: बहुत मुस्कुरा रहे हो बेटा! यही होता है शिवमय होना। पूछ रहे हैं कि “शिवमय होना क्या होता है?” यही है, सोमस्त हो जाओ। सोम जानते हो न क्या होता है, क्या होता है? ख़ुमार; सोमस्त हो जाओ, यही होता है शिवमय होना।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको सुनने से पहले मैं एक भजन सुनता था उसमें बोलते थे कि "सिर से तेरी बहती गंगा, काम मेरा हो जाता चंगा, नाम तेरा जब लेता।" तो भजन सुनते-सुनते मुझे लगता था कि मैं महादेव के कुछ नज़दीक हो गया हूँ और अब मेरा काम चंगा…

प्रश्नकर्ता: शिवलिंग क्या है? इसकी पूजा क्यों की जाती है?
आचार्य प्रशांत: लिंग का जो आध्यात्मिक अर्थ है वो प्रतीक और प्रमाण दोनों होता है। लिंग माने प्रतीक और लिंग माने प्रमाण और इन्हीं दोनों अर्थों के कारण शिवलिंग पूजनीय होता है। एक अर्थ में शिवलिंग द्योतक होता है निराकार…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, अन्यथा समाज में अगर कोई अंधविश्वास फैलता है तो वो जान तो नहीं लेता, आंतरिक रूप से मार देता है पर किसी का शरीर तो नहीं हरता। अगर कोरोना वायरस से उठ रही इस वैश्विक महामारी के समय में कोई अंधविश्वास फैल रहा है तो वो…

आचार्य प्रशांत (आचार्य): तुलसीदास उल्लेख करते हैं एक स्थान पर, वहीं से प्रश्नकर्ता ने ये सवाल रखा है: उल्लेख ये है कि ब्रह्मा जी पार्वती जी से शिकायत कर रहे हैं कि शिव आगा-पीछा देखे बिना, विचारे बिना, दान करते रहते हैं। इतना दान दे देते हैं कि उनके पास…

प्रश्नकर्ता (प्र): शिव और शंकर में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत (आचार्य): आम जनमानस में, आम मन में तो ये एक ही हैं—शिव बोलो कि शंकर बोलो कि भोलेनाथ बोलो कि कैलाशपति बोलो। सहस्त्रों नाम हैं। इनको आप एक ही कह देते हैं। पर अध्यात्म की दुनिया में बाकी सारे…

अचार्य प्रशांत: वास्तव में जब शिव और शक्ति का निरूपण किया जाता है चित्रों में तो बड़े भ्रामक तरीके से किया जाता है। यूँ दिखा दिया जाता है—आपने अर्धनारीश्वर की मुद्राएँ देखी होंगी कि आधे शिव हैं और आधी शक्ति। यह बात बचकानी है। शक्ति ही शक्ति हैं, शिव कहीं…

अपने पर्व पर मुझे जन्म दिया लगा मुझे मैं कृतकृत्य हुआ
पर जैसे-जैसे समझ बढ़ी वैसे-वैसे प्रश्न उठा जो जगत तुमसे ही छल करता उसमें मुझे भेजा क्यों भला
जिस संसार में दुर्पयुक्त होता तुम्हारा ही निशान है उस संसार में बोलो फिर मेरा क्या स्थान है?

प्रश्नकर्ता (प्र): नमस्कार अचार्य जी, आज महाशिवरात्रि है तो महादेव के बारे में कुछ बता दीजिए कि कैसे उनसे हमारी सभ्यता जुड़ी हुई है और कैसे हम मानवों के लिए वे भगवान हैं? किस तरह से वे हमारे लिए उपयोगी हैं? हमें इस तरह से बता दीजिए कि आज ही…

प्रयत्न साधक:
~ शिव सूत्र
प्रश्नकर्ता: सर, प्रयत्न क्या और साधक कौन?

ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…


Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…




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\n\n29 अप्रैल से 1 मई, 2022 तक आयोजित हुए वेदांत महोत्सव के एक प्रतिभागी की प्रेरणास्पद कहानी\n\nमेरा नाम राकेश कुमार है। मैं कानपुर नगर से हूँ। पिछले चार माह से मैं हर…

देखो…
यत्न में हम सब उद्यत रहते हैं। हमारे सारे यत्न भूलने से उपजते हैं। विस्मृत कर देते हैं कि हम हैं कौन, क्या हमारा स्वभाव है और क्या हमें उपलब्ध ही है। ज्यों ये…
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
अब देखिएगा, क्या हो रहा है। कोई कृतज्ञ कब अनुभव करेगा? जब पहले उसकी हालत ख़राब हो और कोई बचाए। आपके भीतर अभी यह इच्छा शेष है कि आप कृतज्ञ अनुभव करती रहें और कृतज्ञता अनुभव करने के लिए ज़रूरी है कि कुछ गड़बड़ हो और फिर उस गड़बड़ से आप उबार ली जाएँ। तो फिर आप कृतज्ञ अनुभव करेंगी कि, अरे, मेरा सौभाग्य कि मुझे किसी ने बचा लिया।
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…
बचना ऐसे लोगों से जो बार-बार तुम्हें अपनी चोट और अपने घाव दिखाते हों। उसके पास जाना जिसके पास चोट भी…

औरतों से मुझे जितनी शिक़ायत है, उतना ही उनको लेकर के दुःख भी है। उनको देखता हूँ, बहुत दुःख लगता है। और शिक़ायत इस बात की है कि वो अपने दुःख का कारण स्वयं हैं। भावना को वो अपना हथियार समझती हैं। देह को वो अपनी पूंजी समझती हैं। देह…

हिंदुस्तान में अभी भी दो जगह हैं जहाँ पर लडकियाँ बहुत कम पायी जाती हैं – लड़कियाँ, स्त्रियाँ सब – एक, श्मशान घाट, दूसरा, सत्संग। दोनों ही जगहों पर सच दिख जाता है न, और दोनों ही जगहों पर देह की नश्वरता दिख जाती है न। समाज नहीं चाहता है…

आदमी यूँ ही नहीं सिगरेट, शराब पीता; उसे कुछ चाहिए जो उसे मिल नहीं रहा इसलिए वो सिगरेट से क्षुधापूर्ति करना चाहता है। एक सिगरेट से बात बनती नहीं इसलिए दूसरी सिगरेट पीता है, दूसरी सिगरेट से भी बात बनती नहीं तो तीसरी पीता है, चौथी पीता है, पीता ही…

हम इज़्ज़त को बहुत बड़ी बात समझ बैठते हैं। हमारे जीवन का, समय का, ऊर्जा का, ध्यान का न-जाने कितना बड़ा भाग सिर्फ़ दूसरों की नज़रों में अपनी छवि चमकाने में लग जाता है, है न?
हमारी एक-एक भावना अन्ततः सिर्फ़ एक उद्देश्य के लिए है – इस शरीर को…

किसी ने आपसे पूछा, “अरे! तुमने मुझे पाँच दिन से फ़ोन नहीं किया, तुम्हें मेरी याद नहीं आयी?” आप कहते हैं, “अगर मैं इसको सच बता दूँ तो इस बेचारे के दिल को चोट लगेगी, ये दुख जाएगा।“ तो आप कहते हैं, “नहीं याद तो बहुत आयी, वो नेटवर्क नहीं…

जब शरीर का कोई हिस्सा बड़ी माँग करने लगे किसी भी तरीके से, पेट माँग करता है कि, ‘मुझे भोजन दो’, कहीं दर्द हो गया तो वो जगह माँग करती है कि, ‘मुझे आराम दो, दवा दो।‘
कामोत्तेजना चढ़ने लगी तो जननांग माँग करते हैं कि, ‘हमपर ध्यान दो’, तो…

कोई तुम्हें तुम्हारी ग़लती दिखाए और बुरा अगर तुम्हें लगता है, तो तुम जवान कभी-भी होने से रहे। जिसे जवान होना होता है वो अपनी ग़लतियों का सामना करता है। बहुत होते हैं मोटी खाल के बेशर्म टट्टू, उन्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। उन्हें दिख रहा होगा कि ज़िंदगी…

जिस आदमी के पास स्वार्थ नहीं है वो बहुत ख़तरनाक हो जाता है, क्योंकि अब उसे मजबूर किया नहीं जा सकता; तुम उसकी जान ले सकते हो, उसे मजबूर नहीं कर सकते हो। जिसे मजबूर किया जा सकता हो, जिसे ग़ुलाम बनाया जा सकता हो; जान लो कि ऐसे ही…

दुनिया अगर ताक़त की भाषा समझती है तो ताक़त अर्जित करो। दुनिया अगर पैसे की बात सुनती है तो पैसा होना चाहिए तुम्हारे पास। हाँ, शर्त बस एक है कि तुम्हारी बात सदा सच्ची रहे। यह ना हो कि पैसा आ गया तो बात में झूठ आ गया।
जितना तुम्हारी…

मैं जितने भी कपटी लोगों से मिलता हूँ, उनकी धूर्तता की कोई सीमा नहीं। उनका दिमाग चल रहा है। वो महत्वकांक्षी हैं। वो कुछ भी कर दिखाने को तैयार हैं। उनमें ऊर्जा पूरी है, वो दुनिया पर छा जाने के लिए हौसला रख रहे हैं। उनका आत्मविश्वास देखो!
और मैं…

जो लोग दस दरवाज़ों पर खटखटा रहे होते हैं न उन बेचारों की त्रासदी यही होती है, वह ऐसे होते हैं जैसे कि कोई दस जगह गड्ढा खोदे।
यह ग्रंथों का अपमान है कि उनको एक बार पढ़ कर के किनारे रख दो। “मैंने गीता पढ़ ली!” कि, “मैंने बाइबल…

आपका साथी कैसा है, वो आपको नहीं पता चलेगा जब तक वह आपके साथ है। उसको जानना चाहते हैं तो उस दिन जानिएगा जिस दिन वह आपको छोड़ता है। फिर देखिएगा उसका चेहरा!
जब किसी का आपसे कोई स्वार्थ ना बचे और फिर भी वह आप के प्रति सद्भावना रखे,…

यहाँ तक बताना सबको अच्छा लगता है, “हमें भी आईएएस बनना है”। उसके आगे जैसे ही पूछो न, “क्यों बनना है?” बताने में फिर एक दिक़्क़त हो जाती है । फिर मेरे जैसा हाल हो जाएगा, मुझे पता चल गया था कि क्यों बनना है। तो फिर मैंने हाथ खींच…

तुम्हारा बस काम क्या है? तुम बस कह दो कि, “तू मुझे अधिक-से-अधिक यह दिखा सकता है न हो कि मैं कितना गिरा हुआ हूँ, कितना गिरा हुआ हूँ, कितना गिरा हुआ हूँ मैं मान लूँगा। पर मैं काम करता रहूँगा, मैं जितना भी गिरा हुआ हूँ वहाँ से मैं…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं अनुशासित नहीं रह पाता और मेरे मन में कामुक विचार छाए रहते हैं। अभी आपने जो बताया कि उलझना ही ठीक नहीं, तो मुझे ये समझ नहीं आता कि अगर मैं इन कामुक विचारों से न उलझूँ, तो मुझे फिर मुक्ति कैसे मिलेगी?
आचार्य…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपका हमारे लिए क्या संदेश है?
आचार्य प्रशांत: (प्रेमपूर्वक हँसते हुए) मुझे ही ले चलो, मैं ही संदेश हूँ!
मज़ाक नहीं, मैं ही संदेश हूँ भाई! क्या संदेश दूँगा! जो भी संदेश दूँगा शाब्दिक होगा, तो अधूरा होगा। जैसे जी रहा हूँ देख लो, वही संदेश है।…

प्रश्नकर्ता: इगो (अहंकार) में और सत्य में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: जितने अंतर हैं वह सब इगो में ही हैं। अंतर कुछ कर लो, समानताएँ और अंतर यह सब मानसिक परिकल्पनाएँ हैं। आत्मा में ना कोई भेद होता है, ना अभेद होता है। तुम अगर पूछोगे कि, "अहंकार और…

आचार्य प्रशांत: ज्ञान बिना भक्ति असंभव है। जो ये सोचे कि ज्ञान नहीं होगा, समझेंगे नहीं, बोध नहीं होगा पर भक्त बन जाएँगे, वो आत्मप्रवंचना में है, *सेल्फ-डिसेप्शन*। उसकी भक्ति फिर ऐसी ही होगी, कैसी वाली? (आँखें बंद करके भजन करने का अभिनय करते हुए) ये वाली भक्ति होगी।
असली…

प्रश्नकर्ता: सादर प्रणाम, मेरा प्रश्न ये है कि सब कुछ जानने के बावजूद भी हम अंजान क्यों बने रहते हैं या यूँ कहें कि कोई ऐसी शक्ति है जो हमे अंजान बने रहने के लिए बाध्य करती है? ऐसा क्यों होता है आचार्य जी, मुझे समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: सब कुछ…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, हमारा मन शरीर से ज़्यादा बलशाली है। और आत्मा के विषय में गुरुजनों से सुना है कि मन से भी ज़्यादा बलशाली है। ऐसा क्यों होता है कि हम भूल-चूक करते हैं और क्या इसका मतलब यह हुआ कि भूलना जो कि मन के तल पर…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बच्चों को आध्यात्मिक शिक्षा कैसे दें? अभी जैसे अध्यात्म बेस (आधार) पर चल रहा है कि बुनियाद होनी चाहिए। अब मेरा बुनियाद तो नहीं है अध्यात्म और बच्चे पैदा हो गए ऐसे ही। तो उनका भी बेस (बुनियाद) नहीं हो पाएगा। जब मैं ही कोई बात नहीं…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं यूट्यूब के माध्यम से जुड़ा हूँ आपसे करीब दो साल से। उसके बाद आध्यात्मिकता में थोड़ी रुचि बढ़ी। इन दो सालों में मेरे कुछ नज़दीकी मित्र थे जिनकी मृत्यु हो गई। उसके बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं मर रहा हूँ। तो ये…

प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमें क्या सिखाती है?
आचार्य प्रशांत: कुछ सिखाती नहीं है, बस है। आप प्रकृति की बात कर रहे हैं। प्रकृति से तो यही जान लीजिए कि आपके भीतर जो प्रकृति बैठी है, वो बिलकुल वैसी ही है जैसे ये पेड़-पौधे, जानवर।
प्र: प्रकृति कितनी स्थिर और शांत लगती…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अपने परिजनों की मृत्यु के साथ पीड़ा क्यों आती है?
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं मोटी-मोटी। पहली बात तो ये है कि जो कुछ भी अपना है वो अपनी हस्ती का, अपनी अस्मिता का अंग बन जाता है तो वो जब छिनता है तो ऐसा लगता है…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। जीवन में आगे बढ़ने के लिए मन बहुत कुछ पाना चाहता है; मूलतः इसमें आर्थिक लाभ भी छुपा होता है। लेकिन पाँच-छह महीने कुछ करा और फिर कुछ और करने को मन चाहता है। मन को समझने का प्रयास किया, आप के कुछ वीडियोज़ (चलचित्र) देखे।…

प्रश्नकर्ता: मुझे ग्यारहवीं और बारहवीं में शिक्षकों द्वारा यह दबाव बनाया जाता था कि तुम केवल पाठ्यक्रम का ही पढ़ो पर मैं उन पर ध्यान ना देकर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी करता था। मुझे अच्छा कॉलेज भी मिल गया इस कारण। लेकिन अभी कॉलेज में मैं एक्स्ट्रा को-करिकुलर एक्टिविटी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल मैं एक मीटिंग में था और जो सज्जन मेरे सामने थे उन्होंने बात-बात में ऐसे ही, ज़रूरत नहीं थी, उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के जो दो मूल शब्द हैं — सकाम कर्म और निष्काम कर्म, उनका प्रयोग ऐसे ही कर दिया हवा में। मैं ये सोच रहा था…

प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते, परिवार से, दोस्तों से और मोटिवेशनल स्पीकर्स से बहुत सारी मोटिवेशनल पंक्तियाँ सुनी हैं जैसे कि थिंक बिग, बड़ा सोचो, हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती, नेवर गिव अप (कभी हार न मानो), विनर्स नेवर क्विट एंड क्विटर्स नेवर विन (जीतने वाले कभी खेल…

प्रश्नकर्ता: आज आपको सामने देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है। इस ख़ुशी के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। जैसे अर्जुन को साक्षात ईश्वर के दर्शन हुए थे वैसे मुझे भी लग रहा है। मैं आपके सामने झोली फैलाकर आई हूँ। मैं वह पाना चाहती हूँ जो आपके अंदर…

आचार्य प्रशांत: ''टोसुई का सिरका'' अब कहानी ज़रा ध्यान से सुनो।
टोसुई एक ज़ेन गुरु थे, जिन्होंने आश्रम के पारम्परिक ढंग के जीवन को त्याग दिया था और एक पुल के नीचे भिखारियों के साथ जीवन यापन शुरू कर दिया था। जब वे बूढ़े हो रहे थे तो उनके एक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी के चरणों में कोटि–कोटि नमन। गुरुजी, मैं एक अध्यापक हूँ और बच्चों को शिक्षित करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। अक्सर मेरे समक्ष कुछ ऐसे शिष्य भी आ जाते हैं जो आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर होते हैं, तो उनसे बिना कोई फ़ीस इत्यादि लिए मैं उन्हें…