प्रश्नकर्ता: आज आपको सामने देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है। इस ख़ुशी के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। जैसे अर्जुन को साक्षात ईश्वर के दर्शन हुए थे वैसे मुझे भी लग रहा है। मैं आपके सामने झोली फैलाकर आई हूँ। मैं वह पाना चाहती हूँ जो आपके अंदर है। मुझ पर कृपा करें। मुझे अपने चरणों में स्थान दें। मुझे और कुछ नहीं मालूम।
आचार्य प्रशांत: देखिए अध्यात्म का लक्ष्य यह नहीं होता है कि कोई भी किसी के चरणों में स्थान पाए। अध्यात्म का लक्ष्य यह भी नहीं होता कि कोई किसी के गले लग जाए। लक्ष्य होता है अद्वैत। लक्ष्य होता है कि जिसको भी आप गुरु देखते हैं उसकी गुरुता आप में भी प्रतिष्ठित हो जाए।
गुरु ऊपर है चेला नीचे है, चरण बंधन चल रहा है। यह सब देखने-सुनने में अच्छा लगता है। शायद एक प्रक्रिया के तौर पर आवश्यक भी है कभी-कभार। लेकिन ये अंत नहीं है। यह उद्देश्य नहीं हो सकता। और अगर बताने वाले ने — जिसको आप गुरु कहे या कुछ भी — आपके मन में यही उद्देश्य बैठा दिया कि गुरुदेव के तो चरण ही स्पर्श करते रहने हैं। या गुरुदेव के प्रति तो प्रेम से ही भरे रहना है। तो गड़बड़ हो जाएगी।
चरण स्पर्श करने में द्वैत का बखेड़ा है इतना तो आपको दिख ही रहा होगा। एक ऊपर है एक नीचे है। गले लगने में भी द्वैत है। भूलिएगा नहीं कि प्रेम भी द्वैत का ही एक उदाहरण है। क्योंकि प्रेम के लिए भी कितने चाहिए? दो। तो प्रेम भी अधिक-से-अधिक साधन हो सकता है, उपकरण हो सकता है, आध्यात्मिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, अंत नहीं है। अंत नहीं है प्रेम। अंत माने लक्ष्य।
तो अगर जो आपको बता रहा है—मित्र, शिक्षक, गुरु जो भी कहिए—अगर वो वाकई आपका भला चाहता है तो वो यह नहीं कहेगा कि, "तुम मुझसे कुछ सीखते ही रह जाओ या मुझसे कुछ पा लो।" वह कहेगा, "तुम बिलकुल मेरे जैसे हो जाओ।" और मेरे जैसे हो जाने का क्या मतलब है? कि मेरे दाढ़ी है आप भी दाढ़ी रख लें? या कि मैं अपना पंथ चला दूँ आप उस पंथ की सदस्य हो जाएँ?


