अपने पर्व पर मुझे जन्म दिया लगा मुझे मैं कृतकृत्य हुआ
पर जैसे-जैसे समझ बढ़ी वैसे-वैसे प्रश्न उठा जो जगत तुमसे ही छल करता उसमें मुझे भेजा क्यों भला
जिस संसार में दुर्पयुक्त होता तुम्हारा ही निशान है उस संसार में बोलो फिर मेरा क्या स्थान है?
हे अचिन्त्य!
देखो तुम्हारे बारे में सौ किस्से वो गढ़ रहे
हे अभीरु!
देखो तुम्हारे नाम पर भय का व्यापार कर रहे
हे पशुपति!
तुम्हारा ही नाम लेकर वो पशुओं का पीड़न कर रहे
हे बोधमूर्ति!

