प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको सुनने से पहले मैं एक भजन सुनता था उसमें बोलते थे कि "सिर से तेरी बहती गंगा, काम मेरा हो जाता चंगा, नाम तेरा जब लेता।" तो भजन सुनते-सुनते मुझे लगता था कि मैं महादेव के कुछ नज़दीक हो गया हूँ और अब मेरा काम चंगा हो जाएगा। लेकिन मेरी लाइफ का ग्राफ ऊपर से नीचे जा रहा था तो मैं सोचता था कि शायद भजन कम सुन रहा हूँ। तो मैं और भजन बढ़ा देता था लेकिन ग्राफ और नीचे चलता चला जा रहा था। इस तरह के भजन जो मीनिंगफुल (अर्थपूर्ण) नहीं होते, उसमें मनोरंजन तो है लेकिन अब उसमें महादेव का नाम आ जाता है तो ये समझ में नहीं आता कि ये धार्मिक है कि नहीं।
आचार्य प्रशांत: देखिए, इस वक़त जितना अपमान, दुर्भाग्यवश, महादेव शिव का कर रहे हैं उससे ज़्यादा किसी का नहीं। शिव को खिलवाड़ बना लिया है, बिलकुल उनके नाम पर जो बोलना है बोलो, उनके नाम पर जो कुछ भी कहना है कहते रहो, उनके नाम पर यूँ ही अपनी कुछ बात फ़ैला दो कि ऐसा कर दो वैसा कर दो। शिव क्या हैं, शिवत्व क्या है, दूर-दूर तक कोई समझ नहीं, कुछ नहीं। और ये बहुत-बहुत बुरे लक्षण हैं। ये लक्षण आपदा के हैं। इससे ज़बरदस्त संकट आना है, आ गया है क्योंकि जो सबसे ऊँचा है अगर आपने उसी के नाम के साथ खिलवाड़ कर लिया तो अब क्या बचा आपके लिए?
अभी कोई मेरा वीडियो रहा होगा जिसमें मैंने कहा कि धर्म और दूध का जो व्यर्थ रिश्ता बना रखा है उसको ख़त्म करो। तो लोगों ने आकर के कहा कि "शिवलिंग पर दूध चढ़ाना बहुत ज़रूरी है क्योंकि हमारे गुरु जी ने बताया है कि जो दूध का फैट होता है वो शिवलिंग के पत्थर को चटकने से रोकता है।" जब धर्म के नाम पर इस तरह की बातें होनी शुरू हो जाएँ तो समझ लेना सब कुछ ख़तरे में है।
शिव का कुछ पता नहीं, शिवत्व से प्रेम नहीं और शिवलिंग की इतनी बातें। लिंग का तो मतलब होता है प्रतीक, इशारा कि जिसको देख कर के जो असली है उसकी याद आ जाए।


