आचार्य प्रशांत (आचार्य): तुलसीदास उल्लेख करते हैं एक स्थान पर, वहीं से प्रश्नकर्ता ने ये सवाल रखा है: उल्लेख ये है कि ब्रह्मा जी पार्वती जी से शिकायत कर रहे हैं कि शिव आगा-पीछा देखे बिना, विचारे बिना, दान करते रहते हैं। इतना दान दे देते हैं कि उनके पास भी कुछ नहीं बचता। ये सुनकर पार्वती भी मुस्कुराती हैं और शिव भी मुस्कुराते हैं। तो पूछा है कि ये क्या माजरा है?
दुनिया का गणित कहता है कि दोगे तो घटेगा और दुनिया ही देखी है तुमने। तो ज़ाहिर ही है कि ऐसा प्रतीत होगा कि दिया तो, किसी और को मिल गया और मेरा कम हो गया। ये दुनिया का गणित है। ये गणित तब लागू होता है जब कुछ शर्तें पूरी होती हों, जब कुछ सीमाएँ तय हों। ये गणित तब लागू होता है जब देने वाले के पास पहली बात तो सीमित हो। और दूसरी बात देने वाले का उद्देश्य हो अपने पास कुछ बचा कर भी रखना। और तीसरी बात देने वाला पाने वाले से अपने-आपको भिन्न समझता हो। और चौथी बात देय वस्तु ऐसी हो जो देने से घटती हो। ये चारों हीं शर्तें शिव के ऊपर उपयुक्त नहीं होतीं।
जो दे रहे हैं शिव, वो देने से घटता नहीं है, वो देने से बढ़ता है और शिव चूँकि शिव हैं इसलिए उनके पास है ही वो वस्तु जो देने से बढ़ेगी। हमारे पास जो कुछ होता है वो इस लायक ही नहीं होता कि वो हमारे पास भी हो और इसका प्रमाण ये है कि जब तुम उसको बाँट देते हो तो वो कम हो जाता है।
अपने पास रखना ही वही, अपनी पहचान ही उससे करना जो दिए जाने पर बढ़ता हो, कम न होता हो। अगर तुम्हारी संपदा उन्हीं चीज़ों की है जो या तो तुम्हारी हो सकती है या किसी और की तो तुम बड़े दरिद्र हो। और अगर तुम्हारे पास वो है जो बाँटने पर दोगुना हो जाता है और न बाँटने पर जिसका क्षय हो जाता है तो तुम्हारे पास है कुछ।
दुःख और है क्या? यही भावना तो है न कि कुछ छिन जाएगा, कि कुछ मिट गया। अब कहाँ बचा दुःख तुम्हारे लिए अगर जो चीज़ छिनती हो वो छिनने के कारण ही दूनी हो जाती हो। अब बताओ जो मरने से ही अमर हो जाता हो उसे अब मरने का खौफ रहेगा क्या? जो मिटने से अमिट हो जाता हो उसे अब मिटने का खौफ़ रहेगा क्या? जिसको दे देने से जिसकी राशि दोगुनी हो जाती हो उसके देने में अब तुम संकोच करोगे क्या?



