प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपका हमारे लिए क्या संदेश है?
आचार्य प्रशांत: (प्रेमपूर्वक हँसते हुए) मुझे ही ले चलो, मैं ही संदेश हूँ!
मज़ाक नहीं, मैं ही संदेश हूँ भाई! क्या संदेश दूँगा! जो भी संदेश दूँगा शाब्दिक होगा, तो अधूरा होगा। जैसे जी रहा हूँ देख लो, वही संदेश है। तो पूरा संदेश सुनना हो तो आ जाओ कभी, ज़िंदगी देख लो मेरी, वही संदेश है।
(एक श्रोता को इंगित करते हुए) क्यों रे!
प्र२: नमस्कार आचार्य जी। मैं काफ़ी समय से विभिन्न गुरुओं को सुन रहा हूँ, मगर हम इतना सुनने-समझने के बाद भी उनको अपने जीवन में क्यों नहीं उतार पाते?
आचार्य: राहत की साँस लो, बच गए। उनको उतार लिया होता जीवन में, तो फिर ये सवाल भी नहीं पूछ रहे होते; कहते, “बस उतर गया जीवन में, उतर ही गया!” फिर वो खड्डे में उतर रहे होते, उनके पीछे-पीछे तुम भी उतर रहे होते। उतार लिया उन्होंने तुम्हें!
प्रश्न में ही विरोधाभास है, देख नहीं रहे हो? कह रहे हो, “इतना सुनने-समझने के बाद भी जीवन में उतार क्यों नहीं पाते?” यदि गुरु वास्तव में श्रवण योग्य है, और तुमने उसको सुना है, समझा है, गुना है, तो अब जीवन में उतारने के लिए बचा क्या? जिन्होंने जाना है, उन्होंने तुमसे इतना ही तो कहा है - श्रवण, मनन, निदिध्यासन। और किसी ने पूछा, “और क्या?” तो कहा, “समाधि।” श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि— इसमें कर्म कहाँ है, जीवन में उतारना कहाँ है? इसमें कहीं लिखा है, कि “ये चार सोपान हैं, और तीसरे और चौथे सोपान के मध्य जो सुना है वो जीवन में उतरेगा”? वो बात ही कहने जैसी नहीं है, वो बात ही स्वयंसिद्ध है, कि अब जीवन में उतारने को बचेगा क्या! अगर श्रवण भी है और मनन भी है और अभ्यास भी है, फिर शांति भी है, तो अब ये कमी कहाँ से रह गई कि जीवन में नहीं उतरा? उतर तो गया जीवन में!

