प्रयत्न साधक:
~ शिव सूत्र
प्रश्नकर्ता: सर, प्रयत्न क्या और साधक कौन?
आचार्य प्रशांत: “प्रयत्न साधकः”
यत्न में हम सब उद्यत रहते हैं। हमारे सारे यत्न भूलने से उपजते हैं। विस्मृत कर देते हैं कि हम हैं कौन, क्या हमारा स्वभाव है और क्या हमें उपलब्ध ही है। ज्यों ये भूले कि मैं कौन और क्या मुझे मिला ही हुआ है, त्यों ही ये हसरत जगती है कि उसको हासिल करूँ जो खोया-खोया सा लगता है।
खोने और भूलने में फ़र्क़ है। तुम बिना खोए भी ये भूल सकते हो कि कुछ तुम्हारे पास है। तुम अपनेआप को खोए बिना भी अपनी पहचान बिलकुल भूल सकते हो और भूलने का तुरंत परिणाम होता है- खोजने की कोशिश। “खो गया है – खोजो। मिट गया है – हासिल करो।”
तो यत्न में हम रत रहते हैं। भूलने का परिणाम है, यत्न। भूले, और हासिल करने निकल पड़े। ये हमारा आम संसारी है, जो हासिल करने की दौड़ में लगा हुआ है।
फिर आता है साधक; साधक को कुछ याद-सा आने लगा है। साधक को कोई चीज़, जैसे बिजली-सी कौंध जाती है, हल्की-सी एक आवाज आती है, लौटने की। उसके कर्म अब उस याद करने के कारण होते हैं, भूलने के कारण नहीं।

