प्रश्नकर्ता: सादर प्रणाम, मेरा प्रश्न ये है कि सब कुछ जानने के बावजूद भी हम अंजान क्यों बने रहते हैं या यूँ कहें कि कोई ऐसी शक्ति है जो हमे अंजान बने रहने के लिए बाध्य करती है? ऐसा क्यों होता है आचार्य जी, मुझे समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: सब कुछ जान लिया होता तो जो जाना गया है वही आपका मालिक बन जाता न। छोटी बातें जानोगे तो चूँकि वो बातें छोटी हैं तो उनके मालिक आप रहोगे। छोटी चीज़ को तो बस में किया जा सकता है न। जो एक तत्व जानने लायक है, वो बहुत बड़ा है। उसको जिसने जान लिया वो उस तत्व का मालिक नहीं रह पाता। उसे उस तत्व का ग़ुलाम हो जाना पड़ता है।
आमतौर पर ज्ञानी ज्ञान का मालिक होता है। पर जब भी तुम अपने ज्ञान के मालिक हो तो ये साफ़ समझ लेना कि ये ज्ञान छोटा है और बस तुम्हारे पूरवर्ती इरादों को पूरा करने के काम आएगा। जैसे कि तुमने मंज़िल पहले से ही तय कर रखी हो और किसी से पूछो कि रास्ता बता दीजिए। ये अभी-अभी जो तुम्हें ज्ञान मिला रास्ते का, ये तुम्हारी मंज़िल तो नहीं बदल देने वाला न? मंज़िल का इरादा पहले से तय है, ये जो अभी ज्ञान मिला है ये पहले से तय इरादे की सेवा में काम आने वाला है बस।
आमतौर पर हमारा सारा ज्ञान ऐसे ही होता है। मंज़िल हमारी पहले से ही तय होती है। उस मंज़िल का नाम है इंद्रियगत भोग। क्या नाम है? इंद्रियगत भोग। उस मंज़िल तक पहुँचने के लिए आदमी जीवन भर ज्ञान इकट्ठा करता है। आपने आजतक जो भी ज्ञान इकट्ठा करा हो उसको ज़रा इसी कसौटी पर कसें। क्या वो भोग के काम नहीं आ रहा है? बिलकुल जो निर्विवाद उदाहरण है वो तो व्यवसायिक पाठ्यक्रमों का है, प्रोफेशनल कोर्सेज, वहाँ भी जा करके ज्ञान ही इकट्ठा किया जाता है न। वो ज्ञान क्यों इकट्ठा किया जाता है? ताकि उससे कोई व्यवसाय चला सको। उस ज्ञान के दम पर व्यवसायिक उपलब्धि हासिल कर सको। पैसा कमाओ और भोगो। और भी जो आपको ज्ञान है वो आप पाएँगे कि उस ज्ञान का उपयोग भोग के लिए ही किया गया है।

