
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…


प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं…

बहुत सारा मेडिटेशन वगैरह वही है जो आपको झटका नहीं खाने देगा। ज़िन्दगी बर्बाद चल रही है, सबकुछ आपका ग़लत है, लेकिन सुधरने की कोई ज़रूरत नहीं। आधे-एक घण्टे बैठ करके गाइडेड मेडिटेशन कर लो, वहाँ तुमको गुरुजी कान में बता देंगे कि तुम एक सरोवर के किनारे बैठे हो,…

कार खरीद कर और फर्नीचर खरीद कर ज़िंदगी नहीं बन जाती है। सुख के नाम पर क्या है? एक गाड़ी है, एक ईएमआई पर घर खरीद लिया है, एक घर पहले से था, फिर बीवी है जो बुढ़ा रही है, दो बच्चे हैं जो खून पीने को तैयार हो रहे…

प्रेम का अर्थ ये नहीं कि, “तुम मुझे खुश रखो, मैं तुम्हें खुश रखूँ।“ बिलकुल भी नहीं!
जिससे देह का सुख मिल गया, जिससे मन का सुख मिल गया, धन का सुख मिल गया उसी को कह दिया, ‘इससे प्रेम है।‘ यही है न प्रेम हमारा?
दूसरे को सुख देने…

ये मेडिटेशन चीज़ क्या है? मैं बताता हूँ यह चीज़ क्या है, यह फ़र्ज़ी चीज़ है, यह फ़रेब है, यह आत्म-प्रवंचना है, ख़ुद को धोखा है। यह जीवन के आमूलचूल बदलाव का तरीका नहीं है, यह कुछ समय का आध्यात्मिक मनोरंजन है। यह आपको आपकी गंदी दिनचर्या के तनाव से…

ये लाज की, धिक्कार की बात है कि छोटे से सुख से ही खरीद लिया गया। अगर मैं छोटा आदमी होऊँगा ज़रूर, जो छोटे से सुख से बिलकुल लार टपका दी मैंने। फिर सवाल पूछते हैं अपने-आप से कि, “तू इतना गिर गया, इतनी बड़ी चीज़ हो गई तेरे लिए…

सिकंदर दुनिया में सिर्फ़ एक ही है असली; कौन? जो घड़ी को हरा दे। वरना बहुत बड़े-बड़े बादशाह हो गए, सब से जीत लेते हैं, किससे हार जाते हैं? घड़ी से; घड़ी से जीत कर दिखाओ तो बात है! समझ में आ रही बात?
वो टिक-टिक लगातार याद रहे। कलाई…

एवं देहद्वयादन्य आत्मा पुरुष ईश्वरः। सर्वात्मा सर्वरूपश्चसर्वातीतोऽहमव्ययः।।
इस प्रकार आत्मा पुरुष या ईश्वर स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों प्रकार के शरीरों से भिन्न है। अतः मैं सर्वात्मा, सर्वरूप, अविनाशी और सबसे परे हूँ।
~ अपरोक्षानुभूति (श्लोक ४०)
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) शंकराचार्य के श्लोक को उद्धृत किया है, “आत्मा स्थूल…

आचार्य प्रशांत: बारहवाँ अध्याय।
देवी बोलीं – “देवताओं! जो एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा सत्वन करेगा, उसकी सारी बाधा मैं निश्चय ही दूर कर दूँगी।”
“जो मधुकैटभ का नाश, महिषासुर का वध तथा शुम्भ-निशुम्भ के संहार के प्रसंग का पाठ करेंगे तथा अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी को भी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रसंग में बताया गया है कि देवताओं ने बहुत लंबे समय तक सुख से राज्य किया, फिर उनके ऊपर दु:ख आया, तब जाकर उन्होंने देवी की स्तुति की। फिर आपने यह भी बताया कि धूल को लगातार साफ़ करते रहना होता है। हमारे साथ भी ऐसा ही…

आचार्य प्रशांत: दूसरे चरित्र का जो अंतिम अध्याय है, चतुर्थ अध्याय, उसे मैं पढ़े देता हूँ। पहले सुन लें, फिर उस पर चर्चा करेंगे।
"अत्यंत पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर तथा उसकी दैत्य सेना के देवी के हाथ से मारे जाने पर इंद्र आदि देवता प्रणाम के लिए गर्दन तथा कंधे झुकाकर…

आचार्य प्रशांत: अब हम तृतीय अध्याय में प्रवेश करते हैं। जहाँ पर दूसरे अध्याय का समापन है, तृतीय अध्याय वहीं से आगे बढ़ता है। तो युद्ध चल रहा है विकराल, और एक के बाद एक दैत्य सेनापति आ करके देवी से संघर्ष कर रहे हैं।
चिक्षुर नाम का असुर आता…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जिस तरह से दैत्यों की सेना के बारे में बताया है कि बहुत शक्तिशाली हैं, बहुत सारे सैनिक हैं, तो ये क्या जो हमारी वृत्तियाँ हैं, उनकी शक्तियों के बारे में बताया जा रहा है?
आचार्य प्रशांत: बिल्कुल वही है, बिल्कुल वही बात है।
प्र: उनकी शक्ति…

आचार्य प्रशांत: फिर देवी का और दैत्यों का संग्राम होता है और वो संग्राम बड़े विस्तार के साथ वर्णित है पूरे मध्यम चरित्र में। कि दैत्यों के इस सेनापति ने हमला किया तो देवी ने फिर कैसे उसको परास्त किया, वो किन-किन अस्त्रों का प्रयोग करके देवी पर आघात कर…

आचार्य प्रशांत: द्वितीय अध्याय में जो युद्ध है, वो लम्बा चला, सौ सालों तक चला। उसमें देवताओं का नेतृत्व इंद्र के पास था और दानवों की ओर से महिषासुर था। सब देवता हारे और महिषासुर ही इंद्र बन बैठा। इंद्र माने राजा, जो जगत में अधिकार रखेगा, जो जगत की…

आचार्य प्रशांत: तो दुर्गा सप्तशती के दूसरे चरित्र का हम आरम्भ करते हैं। और जो ये दूसरा या मध्यम चरित्र है, इसमें अध्याय दो, तीन और चार सम्मिलित हैं। और इस चरित्र की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी हैं। ठीक वैसे जैसे प्रथम चरित्र की अधिष्ठात्री देवी महाकाली थीं।
तो क्या होता…

प्रश्नकर्ता: जैसे वृत्तियाँ होती हैं। वृत्ति होती है, फिर विचार का तल आता है। तो विचारों में कई बार फिर भी होता है कि विचार मन में घूम रहे होते हैं तो आप फिर भी उसे कई बार पकड़ पाते हो कि हाँ, अच्छा ऐसा कुछ चल रहा है और…

प्रश्नकर्ता: दुर्गासप्तशती के प्रथम चरित्र में दो असुर मधु और कैटभ के बारे में बात हुई है, क्या वो एक तरीके से वृत्ति के ही रूप हैं?
आचार्य प्रशांत: आप अगर निद्राग्रस्त हो, कौन सी निद्रा? चेतना की निद्रा, तो आपके शरीर का मैल ही असुर है। जब आप माया…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी जो दुर्गासप्तशती में कहानी बताई, इसमें असुरों का जन्म भी भगवती महामाया से हुआ और उनका संहार भी भगवती महामाया के द्वारा हुआ अर्थात वृत्तियाँ भी प्रकृति ने पैदा की और वृत्तियों का नाश भी वृत्ति ही कर रही है।
आचार्य प्रशांत: नहीं, वृत्ति कुछ नहीं…

प्रश्नकर्ता: क्या बुद्धि और प्रकृति एक ही तल पर हैं?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति का छोटा सा अवयव है बुद्धि।
प्र: और अभी मनुष्यों में भी प्रकृति जो है बुद्धि के माध्यम से ही अभिव्यक्ति पा रही है।
आचार्य: प्राकृतिक ही है बुद्धि। देखो न, इतने जीवो को देखो, सबकी बुद्धि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वृत्ति को या उस शक्ति को जो हमें समझने नहीं देती या देखने नहीं देती या जिस कारण से फँसे हुए हैं, उसको जनरल (सामान्य), न्यूट्रल (उदासीन) भी रखा जा सकता था, जैसे ब्रह्म कहते हैं तो जनरल न्यूट्रल होता है। इंसान रूप में जो स्त्री है…

आचार्य प्रशांत: विष्णु भगवान सो रहे हैं। तो इनके कानों के मैल से दो असुर पैदा हो गए, मधु और कैटभ। इन्होंने बड़ा उत्पात मचाया। और ये ब्रह्मा को मारने को तत्पर हो गए, बोले कि मारेंगे ब्रह्मा को। और लगे हैं पीछे ब्रह्मा के, ब्रह्मा वहाँ से भागे कि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी तक जो विवरण रहा, उसमे ऐसा लग रहा है कि जैसे देवी जी कोई व्यक्तित्व हों और हमसे बाहर का कुछ हों, तो इसको मन के तल पर कैसे समझा जा सकता है?
आचार्य: देखो, आत्मा सत्य है, आत्मा का ही दूसरा नाम ब्रह्म है। आत्मा…

आचार्य प्रशांत: तो ऋषि मारकंडेय हैं मार्कंडेय पुराण में और वे अपने शिष्यों को दीक्षा दे रहे हैं, सुना रहे हैं, समझा रहे हैं। और शिष्यों में कौन हैं? पक्षी हैं। तो ऐसा ही है, भाई। पुरुष प्रकृति को कुछ कह रहा है तो प्रकृति पक्षी का रूप लेकर भी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। उपनिषद् या जितने भी प्रमुख ग्रंथ हैं, वहाँ पर, जितना मुझे पता है, फेमिनिन ऐसपेक्ट (स्त्रीत्व) की जब भी बात हुई है तो प्रकृति के रूप में या माया के रूप में हुई है और इसको बहुत ग्राॅस टर्म्स में (मोटे तौर पर) कहें तो एक…

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥२, १५॥
क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक १५
प्रश्नकर्ता: श्रीभगवद्गीता में श्रेष्ठ बुद्धि वाले मनुष्य के…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप हमें जो ज्ञान देते हैं, वह कहाँ से आता है?
आचार्य प्रशांत: कल कहा था न मैंने कि आप मुझसे सीख रहे हो और मैं आपसे सीख रहा हूँ। ज़िन्दगी देखता हूँ, और ज़िन्दगी में वो सारे गुरुजन शामिल हैं जो इस संसार में रहे और…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं चौबीस साल का हूँ और मेरा सवाल ये है — हमारे जीवन में उदासी क्यों बनी रहती है?
मैं बहुत बार जब अपने-आपको देखता हूँ तो किसी-न-किसी विचारों में बहुत बार लिप्त हो जाता हूँ, और ख़ुद को पाता हूँ कि उदास ही हूँ, वो…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं अपने भीतर लगातार एक बेचैनी अनुभव करती हूँ और उस बेचैनी के मूल में मैंने एक पैटर्न (ढ़ाँचे) को ऑब्ज़र्व (निरीक्षण) किया है। वह पैटर्न (ढ़ाँचा) इस प्रकार है — मैं चेतन रूप से, कॉन्शियसली, जानबूझकर खुश और अच्छा अनुभव करने की कोशिश करती…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सामान्यत: तो हम ऐसे होते हैं कि अपने लिए कर्म करते हैं, अपने हित का सोचते हैं। और अपने लिए ना करने का चुनाव, यह करने वाले भी क्या हम ही होते हैं?
आचार्य प्रशांत: वो तो एक सुंदरता होती है जो तुमको असहाय कर देती है,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पहले कहा कि चेतना को पूर्णता चाहिए, यानी सत्य चाहिए, वो बिंदु चाहिए। लेकिन चेतना छली जाती है, यानी कि सुख से छली जाती है एक तरह से। तो उस सुख में ऐसा क्या है जो वो सत्य जैसा प्रतीत होता है?
आचार्य प्रशांत: दुःख का…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार ऐसा होता है कि उलझन आती है तो हम उसे ऑब्ज़र्व (ध्यान से देखना) करते हैं, उसपर सोचते हैं कि क्या उसका सल्यूशन (समाधान) हो सकता है। उस समय लगता है हाँ समझ गया मैं प्रॉब्लम क्या है। उस समय के लिए लगता है समझ…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप अपनी किताब में कहते हैं कि ध्यान की विधियों से कुछ नहीं होगा, लेकिन क्या कुछ देर बैठ कर अपने विचारों को देखना सही नहीं है? क्या इससे कुछ पलों का चैन नहीं मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: सटीक उदाहरण नहीं दे रहा हूँ पर इशारा समझना। चुप-चाप…

प्रश्नकर्ता: ध्यान केंद्रित करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
आचार्य: ध्यान केंद्रित कैसे करें। अभी सुन रहे थे तुम?
प्र: जी सर।
आचार्य: ध्यान से सुना?
प्र: जी।
आचार्य: ध्यान से? क्या उसके लिए कोई विधि लगाई ध्यान केंद्रित करने के लिए?
प्र: नहीं, यहाँ पर तो नहीं लगाई…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पहले मैं ध्यान करता था, लेकिन जब से नाईट शिफ्ट (रात की पाली) लगी है, समय नहीं मिल पाता। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारा कैसा ध्यान था कि ध्यान के बावजूद तुम नाईट शिफ्ट में फँस गए बेटा? ये कौन सा ध्यान था जिसने तुम्हें इतना भी…

प्रश्नकर्ता: आप कहते हैं कि सामान्य ज़रूरतों के लिए बहुत ज़्यादा पैसों की ज़रूरत नहीं है, पर अगर हमारे पास समय है और सामर्थ्य भी, तो ज़्यादा क्यों न कमाएँ? इस दुनिया में बहुत से सुख हैं जिनको पूरा करने के लिए पैसा चाहिए। उदाहरण के लिए, विश्व भ्रमण करने…

प्रश्नकर्ता: एक सवाल था। बेवकूफ़ी वाला है।
आचार्य प्रशांत: बड़ा वाला सवाल है! गम्भीरता देख रहे हो? पहले ही बता देंगे कि बेवकूफ़ी वाला सवाल है।
प्र: आचार्य जी, मैंने किताबें कुछ ज़्यादा पढ़ी नहीं हैं। कहीं से कुछ मिल जाता है तो, कभी कुछ चीजें ध्यान करते हुए अपने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। ओशो ने हमें ध्यान की विधियाँ दी, आप वो भी छीन रहे हैं। अब हम क्या करें?
आचार्य: नहीं, मैं छीन नहीं रहा विधियाँ। मैं कह रहा हूँ कि विधियों को विधियों जितनी ही महत्ता दो, बस। विधि द्वार है। द्वार को द्वार जितनी ही अहमियत…

प्रश्नकर्ता: क्या बीस मिनट का ध्यान करना सही है?
आचार्य प्रशांत: खेल की तरह करो, तो कुछ भी गलत नहीं है। हाँ, तुम ये सोचोगे कि किसी विधि का पालन करके तुम्हें सत्य मिल जाएगा, तो ये बात बेवकूफी की है। सही-गलत नहीं है; बेवकूफी है।
प्र: कैसी विधि से…

प्रश्नकर्ता: जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय ये चार अवस्थाएँ क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: इसका जो शास्त्रीय तरीक़ा है बताने का, शुरुआत वहाँ से करेंगे। दस तो मानी गई हैं इंद्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। और उसके अलावा होता है अन्तःकरण। अन्तःकरण क्या? अन्तःकरण चतुष्टय, जिसमें चार आते हैं। कौन…

निःसंगो निष्क्रियोऽसि
त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः।
अयमेव हि ते बन्धः
समाधिमनुतिष्ठति॥१-१५॥
आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ॥15॥
~ अष्टावक्र गीता
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र इस श्लोक में ऐसा क्यों कह रहे हैं कि ध्यान की हर विधि…

प्रश्नकर्ता: जब ध्यान राम के पास नहीं होता, तो उस समय नहीं पता चलता, बाद में होश आता है। कैसे हर पल पता रहे कि ध्यान कहाँ है?
आचार्य प्रशांत: एक छोटी सी कहानी सुनाऊँगा, अच्छा प्रश्न है। मैं कॉलेज में था तो ऐसा बहुत होता था कि जो लोग…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी जीवन को जानना क्यों ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: एकदम ज़रूरी नहीं है!
प्र: लेकिन मैंने यूट्यूब और कहीं-कहीं से देखकर कई बार जानने की कोशिश किया कि ये शरीर नहीं है, मन नहीं है, विचार नहीं है और उसके बाद फ़िर अटक जाता हूँ।
आचार्य: यूट्यूब देखना…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मेरा नाम विक्की है, युवा हूँ। मैंने घर की आर्थिक स्थिति के कारण अपनी पढ़ाई छोड़ दी और मैं तीन साल से मल्टी लेवल मार्केटिंग व्यापार में हूँ। मुझे सब कुछ अपने ही दम पर करना है, समृद्ध बनना है। मेरे मित्र नौकरी छोड़कर ध्यान में…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या हममें क्षमता नहीं है जीवन को समझने की? क्या गुरु का होना ज़रुरी है?
आचार्य प्रशांत: ये नहीं कहना चाहिए कि हममें क्षमता नहीं है तो हमें गुरु का सहारा लेना चाहिए। इसको ऐसे कहते हैं कि हमारी ही जो क्षमता है वो हमारे सामने गुरु…

वो चार अलग-अलग महासागरों और आठ अलग-अलग समुद्रों में तैर चुकी हैं।
स्वर्गीय माननीय भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी जी ने उन्हें वाटर एडवेंचर के लिए तेनज़िंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवार्ड से सम्मानित किया है।
वो अंटार्कटिक जल में खुली तैराकी में रिकॉर्ड स्थापित करने वाली पहली एशियाई महिला और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ओशो कहते हैं, "धर्म का सार है- राम खुमारी।" 'राम खुमारी' क्या है? कृपया प्रकाश डालने की अनुकम्पा करें।
आचार्य प्रशांत: तुम जिसे आमतौर पर होश कहते हो, जब समझ उठती है तो ये होश डगमगाने लगता है। ये झूठा होश है। कुछ वैसा-सा ही मज़ा आने…

प्रश्नकर्ता: हमारी खुशियाँ दूसरों पर निर्भर क्यों होती हैं?
आचार्य प्रशांत: पूछ रहे हो हमारी खुशियाँ दूसरों पर निर्भर क्यों होती हैं। हमारा सब कुछ ही दूसरों पर निर्भर है। क्या तुम्हारे दुःख दूसरों पर निर्भर नहीं हैं? क्या सिर्फ़ तुम्हारी खुशियाँ दूसरों पर निर्भर हैं? कोई आकर तुम्हें हँसा…