देव-असुर संग्राम और हज़ारों साल की तपस्या का हमारे लिए क्या अर्थ है? || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

आचार्य प्रशांत: तो दुर्गा सप्तशती के दूसरे चरित्र का हम आरम्भ करते हैं। और जो ये दूसरा या मध्यम चरित्र है, इसमें अध्याय दो, तीन और चार सम्मिलित हैं। और इस चरित्र की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी हैं। ठीक वैसे जैसे प्रथम चरित्र की अधिष्ठात्री देवी महाकाली थीं।
तो क्या होता है इसमें? आरम्भ होता है देवासुर संग्राम से। बड़ा लम्बा संग्राम है जो सौ वर्षों तक चलता है। ये जो देव-दानव संग्राम की कथा है, ये हमें लगातार मिलती है, पुराणों में, महाकाव्य, इतिहासों में। तो ये क्या है?
व्यक्ति के भीतर ही कुछ ऐसा है जो सच्चाई की ओर जाने के लिए आतुर रहता है और व्यक्ति के भीतर ही कुछ ऐसा है जो निरंतर सत्य के विरोध की स्थिति में रहता है। आपकी ही आतंरिक वृत्तियाँ और अज्ञान जिनका दावा रहता है कि वो सच्चाई और दैवीयता के बिना भी प्रसन्न रह लेंगी, ताकतवर रह लेंगी, ये आपकी दानवीयता हुई। और आपकी ही वृत्तियों का वो रुझान जो आपको सच की ओर ले जाता है वो दैवीयता हुई।
तो जो निरंतर हमसे कहा जाता है कि देव और दानव आपस में संघर्षरत हैं, वो वास्तव में मनुष्य के भीतर का ही संघर्ष है आतंरिक। कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है जो मानसिक तौर पर बंटा हुआ न हो, खंडित न हो, और जिसके खंड परस्पर विरोधी भाषा न बोलते हों। और ये सदा से हो रहा है, ये जो गृहयुद्ध है, आतंरिक महासंग्राम है, ये मन की रणभूमि पर चेतना के उदय के क्षण से ही खेला जा रहा है। ये बहुत पुराना युद्ध है, देवासुर संग्राम। और क्योंकि बहुत पुराना है इसीलिए जब आप इसका वर्णन पाते हो कहीं तो ये लिखा होता है कि एक बार देवताओं में और असुरों में सौ वर्षों तक युद्ध हुआ।
अभी प्रथम अध्याय में आपने सुना था कि भगवान विष्णु और मधु कैटभ का पाँच हज़ार वर्षों तक युद्ध हुआ। तो आपको पूछना चाहिए था पाँच हज़ार वर्ष कैसे? पाँच हज़ार वर्ष ऐसे कि पचास हज़ार साल से हर व्यक्ति के भीतर वो युद्ध लड़ा जा रहा है। वो युद्ध तब भी चल रहा था, वो युद्ध आज भी चल रहा है। न देव कभी मारे जाते हैं, न दानव कभी पूरी तरह परास्त होते हैं। जो भी पक्ष पीछे हटता है, वो लौट-लौटकर आता है। यही प्रकृति का चक्र है।

