हमारे भीतर देव कौन और दानव कौन? क्रोध का आध्यात्मिक अर्थ क्या? || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

आचार्य प्रशांत: द्वितीय अध्याय में जो युद्ध है, वो लम्बा चला, सौ सालों तक चला। उसमें देवताओं का नेतृत्व इंद्र के पास था और दानवों की ओर से महिषासुर था। सब देवता हारे और महिषासुर ही इंद्र बन बैठा। इंद्र माने राजा, जो जगत में अधिकार रखेगा, जो जगत की व्यवस्था चलाएगा, महिषासुर ही बन बैठा। और जो बाकी सब भी देवता थे, उनके भी अधिकार महिषासुर ने छीन लिए। चंद्र हैं, वरुण हैं, अग्नि हैं, मारुत हैं, इनके सबके जो अधिकार हैं, सब महिषासुर ने ले लिये, वही सम्राट हो गया।
तो कथा कहती है कि हारे हुए देवताओं ने ब्रह्मा जी को अपने आगे किया और जा करके पहुँचे विष्णु और शिव के पास और अपनी वहाँ पर विनती की, याचिका की। तो उनकी विनती सुनकर, सारा वृतांत सुनकर, विष्णु ने और शिव ने बड़ा क्रोध किया। और विष्णु के क्रोध से ही एक तेज़ उत्पन्न हुआ बड़ा भारी जिसने एक नारी रूप ले लिया।
उसके बाद सब देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियाँ उस रूप को प्रदान करीं। उस नारी के शरीर के जो अलग-अलग अंग थे, वो भी सब देवताओं द्वारा आए और तत्पश्चात सब देवताओं से ही उसको शस्त्र, अलंकार और आभूषण आदि भी मिले। तो एक तेजोमय स्वरुप, एक महानारी का, महादेवी का, इस तरीके से निर्मित हुआ या प्रकट हुआ। और देवी जो प्रकट हुईं, वो अपने प्राकट्य के क्षण से ही कुपित हैं। उन्होंने प्रकट होते ही एक बड़ा भीषण अट्टहास किया जिससे आकाश काँप उठा, समुद्रों में हलचल मच गई, पृथ्वी डोल गई, ऐसा वर्णन है।
अब दो बातें यहाँ पर आती हैं: पहला कि देवी का प्रादुर्भाव कैसे है और दूसरी चीज़ जिस पर हमें चर्चा करनी चाहिए, वो है क्रोध। क्रोध से ही देवी का निर्माण हुआ है और देवी आरम्भ से ही कुपित हैं।
तो जितने भी देवता हैं, वो वास्तव में प्रतिनिधि हैं आपकी आतंरिक शक्तियों के। स्थूल जगत में कोई देवता नहीं होते; देवता तो सब आपके भीतर ही हैं। धरालोक में नहीं हैं वो, देवलोक में भी नहीं हैं वो, और आप देवलोक अगर कहना भी चाहें तो ये कहिए कि देवलोक वास्तव में मानसलोक है। आपके भीतर ही है देवलोक। देवलोक भी, दैत्यलोक भी, पाताललोक भी, जितने भी लोक हो सकते हैं, वो सब आपके लोक हैं।
