ह्रदय में कृपा, युद्ध में निष्ठुरता || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

आचार्य प्रशांत: दूसरे चरित्र का जो अंतिम अध्याय है, चतुर्थ अध्याय, उसे मैं पढ़े देता हूँ। पहले सुन लें, फिर उस पर चर्चा करेंगे।
"अत्यंत पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर तथा उसकी दैत्य सेना के देवी के हाथ से मारे जाने पर इंद्र आदि देवता प्रणाम के लिए गर्दन तथा कंधे झुकाकर उन भगवती दुर्गा का उत्तम वचनों द्वारा स्तवन करने लगे। उस समय उनके सुन्दर अंगों में अत्यंत हर्ष के कारण रोमांच हो आया था। देवता बोले, ‘सम्पूर्ण देवताओं की शक्ति का समुदाय ही जिनका स्वरुप है तथा जिन देवी ने अपनी शक्ति से सम्पूर्ण जगत को व्याप्त कर रख है, समस्त देवताओं और महर्षियों की पूजनीया उन जगदम्बा को हम भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं। वे हम लोगों का कल्याण करें’।”
“जिनके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन करने में भगवान शेषनाग, ब्रह्मा जी तथा महादेव जी भी समर्थ नहीं हैं। वे भगवती चंडिका सम्पूर्ण जगत का पालन एवं अशुभ भय का नाश करने का विचार करें। जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं ही लक्ष्मी रूप से, पापियों के यहाँ दरिद्रता रूप से, शुद्ध अंतःकरण वाले पुरुषों के हृदय में बुद्धि रूप से, सत्पुरुषों में श्रद्धा रूप से तथा कुलीन मनुष्य में लज्जा रूप से निवास करती हैं, उन आप भगवती दुर्गा को हम नमस्कार करते हैं।”
“देवी, आप सम्पूर्ण विश्व का पालन कीजिए, देवी आपके इस अचिन्त्य रूप का, असुरों का नाश करने वाले भारी पराक्रम का तथा समस्त देवताओं और दैत्यों के समक्ष युद्ध में प्रकट हुए आपके अद्भुत चरित्रों का हम किस प्रकार वर्णन करें। आप सम्पूर्ण जगत के उत्पत्ति में कारण हैं। आपमें सतो गुण, रजो गुण तथा तमो गुण, ये तीनों गुण मौजूद हैं, तो भी दोषों के साथ आपका संसर्ग नहीं जान पड़ता।”
“भगवान विष्णु और महादेव आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते। आप ही सबका आश्रय हैं। यह समस्त जग आपका अंशभूत है क्योंकि आप सबकी अधिभूत, अव्याकृता, परा प्रकृति हैं। देवी, सम्पूर्ण यज्ञों में जिसके उच्चारण से सब देवता तृप्ति लाभ करते हैं, वो स्वाहा आप ही हैं। इसके अतिरिक्त आप पितरों की भी तृप्ति का कारण हैं, अतएव सब लोग आपको स्वधा भी कहते हैं।”
