माया: न समझो तो बंधन, समझ गए तो मुक्ति का द्वार || दुर्गासप्तशती पर (2021)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। उपनिषद् या जितने भी प्रमुख ग्रंथ हैं, वहाँ पर, जितना मुझे पता है, फेमिनिन ऐसपेक्ट (स्त्रीत्व) की जब भी बात हुई है तो प्रकृति के रूप में या माया के रूप में हुई है और इसको बहुत ग्राॅस टर्म्स में (मोटे तौर पर) कहें तो एक तरीके से थोड़ा सा नेगेटिव (नकारात्मक) रूप में हुई है शायद। और इसीलिए शायद कई बार ग्रंथों में ऐसे वाक्य भी सुनने के लिए मिले हैं कि स्त्री से बच के रहो, स्त्री मोह में मत पड़ो। इसके बारे में आपने काफ़ी स्पष्टता भी दी है लेकिन इनको वहाँ पर कहा गया है। साथ में इन्हीं कारणों से भी हिंदू धर्म को या ग्रंथों को हमेशा से रिग्रेसिव (प्रतिगामी) या सप्रेसिव (दमनकारी) कहा गया है महिलाओं के प्रति। लेकिन अभी जो आप बात कर रहे हैं पूरी, वह उससे काफ़ी अलग सुनाई पड़ रही है। तो यह भेद क्यों है?
आचार्य प्रशांत: देखो, जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे न, वैसे-वैसे समझ में आएगा। भेद नहीं है, एक अपूर्व, आश्चर्यजनक और मन को स्तंभित कर देने वाला मिलन है। बात यहाँ यह नहीं है कि जो मातृशक्ति है, जो स्त्रीत्व है, उसको अच्छा मानना है या बुरा मानना है। वो अच्छे और बुरे के बिल्कुल बायनरी (दोहरा) विभाजन में समाता नहीं है।
देवी को लेकर मैंने बोला न, जन्म भी देती हैं, पोषण भी करती हैं परंतु कष्ट भी वही देती हैं और मृत्यु भी वही देती हैं। देवी कह लो, प्रकृति कह लो, माँ कह लो। तो सही दृष्टि क्या होनी चाहिए देवी के प्रति, यह बड़ी सूक्ष्म बात है। उतनी सूक्ष्मता आम चित्त में होती नहीं। जब होती नहीं तो फिर इस तरह की बातें आ जाती हैं कि नारी नर्क का द्वार है, कभी कह दिया जाता है। और कभी कह दिया जाता है कि माँ ही मोक्ष है। ये दोनों ही बातें पूरी बात का अंश भी नहीं है। जो पूरी बात है उसको जो समझ गया, वो मुक्त हो जाएगा। क्योंकि जो पूरी बात है, वह यह है कि पुरुष का, माने हमारे चित्त का प्रकृति से संबंध ही क्या होना चाहिए?
न तो आप यही कह सकते हो कि प्रकृति ही सब कुछ है, उसी में लिप्त हो जाओ, लीन हो जाओ और न ही आप प्रकृति के विरोधी और शत्रु हो सकते हो कि प्रकृति का निषेध करो, प्रकृति नर्क है, इससे दूर ही रहना है, उसका बहिष्कार कर दो, इत्यादि-इत्यादि। इन दोनों ही रास्तों में से कोई भी रास्ता अगर यदि अपनाता है कोई तो दु:ख पाएगा।

