प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं अपने भीतर लगातार एक बेचैनी अनुभव करती हूँ और उस बेचैनी के मूल में मैंने एक पैटर्न (ढ़ाँचे) को ऑब्ज़र्व (निरीक्षण) किया है। वह पैटर्न (ढ़ाँचा) इस प्रकार है — मैं चेतन रूप से, कॉन्शियसली, जानबूझकर खुश और अच्छा अनुभव करने की कोशिश करती हूँ जबकि हक़ीक़त में, अवचेतन में, अनकॉन्शियसली, मैं उतनी खुश या अच्छी नहीं हूँ। मैं यह समझना चाहती हूँ कि यह प्रयास मैं सतत-लगातार आखिर क्यों कर रही हूँ?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि समाज ने हमको सिखा दिया है कि खुश रहना चाहिए, "हैप्पी फेसबुक फेस"। तो बाहर की इस सीख को हमने इतना सोख लिया है कि ये बात बिलकुल अंदर तक पैठ गई है। "खुश रहो, हैप्पी रहो", एकदम चेतना की गहराई में पहुँच गई है ये बात। बहुत लोगों ने तो इतना अपने-आपको प्रशिक्षित कर लिया है कि वो सोते समय भी मुस्कुराते रहते हैं। "क्या पता, कोई सोते समय फोटो खींच ले? उसमें कहीं दिख ना जाए कि हम मुस्कुरा नहीं रहे थे। तैयारी पूरी रखो।" कोई पूछे, "क्या हाल है?" तुरंत बोलो, “*आई एम हैप्पी*” (मैं खुश हूँ)। और जो जितना प्रकट करे कि वो प्रसन्न है, उसके बारे में जान लीजिएगा कि वो आनंदित तो नहीं ही है, प्रसन्न भी नहीं है। वो वास्तव में भीतर से दुःखी है।
प्रसन्नता का मुखौटा और होता क्या है? दुःख को ढँकने की एक नाकामयाब साज़िश। ये साज़िश वही करता है जो मन की मूल प्रकृति के बारे में अज्ञानी होता है, जो मन की द्वैतात्मक प्रकृति को समझता नहीं है, जो सुख को दुःख से भिन्न जानता है। जो सुख और दुःख की हक़ीक़त नहीं जानता वही दूसरों को ये प्रदर्शित करने में लगा रहता है कि "मैं तो सुखी हूँ", और जब वो दूसरों के सामने प्रदर्शित करता है कि, "मैं सुखी हूँ", तो उसके इस प्रदर्शन के भुलावे में, बहकावे में आते भी कौन हैं? उसी के जैसे अज्ञानी लोग जो मन को नहीं जानते। तो एक अज्ञानी दिखा रहा है कि वो खुश है और दूसरा अज्ञानी उसकी ख़ुशी को देखकर माने ले रहा है कि वो पहला व्यक्ति खुश है।
आपने कितने अवतारों को मूर्तियों में हँसते हुए देखा है? ज़रा बताइएगा, बोलिए। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, इनको मुस्कुराता पाते हैं? बोलिए। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नौदुर्गा की तमाम देवियाँ, गणेश, इनको मूर्तियों में भी क्या पारम्परिक रूप से हँसता-मुस्कुराता प्रदर्शित किया जाता है? अब गुरुओं पर आइए, दत्तात्रेय हों, आचार्य शंकर हों, जहाँ कहीं भी इनको निरूपित किया जाता है, क्या प्रसन्न निरूपित किया जाता है? बोलिए। जटाधारी शिव हैं, उनकी मूर्तियाँ देखी होंगी। वो ध्यानस्थ दिखाई देते हैं या सुखस्थ? ध्यानस्थ, है न? फिर संतों पर आइए, नानक साहब हों, कबीर साहब हों, इनके चित्र भी कभी आपने देखें कि ये हँस रहे हैं? बोलिए।



