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पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।। ~कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: जैसा कि आप कहते हैं, कि जितना जल्दी हो सके अपने को पूरा अर्पण कर दो, या ख़त्म कर दो, पर यदि इसे समझेंगे और करेंगे, तो अपने अपूर्ण स्थिति…

यदा नाहं तदा मोक्षो
यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किंचिन्-
मा गृहाण विमुंच मा॥८- ४॥
अनुवाद: जब तक 'मैं' या 'मेरा' का भाव है तब तक बंधन है, जब 'मैं' या 'मेरा' का भाव नहीं है तब मुक्ति है। यह जानकर न कुछ त्याग करो और न कुछ ग्रहण ही…

बहुत सारा मेडिटेशन वगैरह वही है जो आपको झटका नहीं खाने देगा। ज़िन्दगी बर्बाद चल रही है, सबकुछ आपका ग़लत है, लेकिन सुधरने की कोई ज़रूरत नहीं। आधे-एक घण्टे बैठ करके गाइडेड मेडिटेशन कर लो, वहाँ तुमको गुरुजी कान में बता देंगे कि तुम एक सरोवर के किनारे बैठे हो,…

ये मेडिटेशन चीज़ क्या है? मैं बताता हूँ यह चीज़ क्या है, यह फ़र्ज़ी चीज़ है, यह फ़रेब है, यह आत्म-प्रवंचना है, ख़ुद को धोखा है। यह जीवन के आमूलचूल बदलाव का तरीका नहीं है, यह कुछ समय का आध्यात्मिक मनोरंजन है। यह आपको आपकी गंदी दिनचर्या के तनाव से…

सिकंदर दुनिया में सिर्फ़ एक ही है असली; कौन? जो घड़ी को हरा दे। वरना बहुत बड़े-बड़े बादशाह हो गए, सब से जीत लेते हैं, किससे हार जाते हैं? घड़ी से; घड़ी से जीत कर दिखाओ तो बात है! समझ में आ रही बात?
वो टिक-टिक लगातार याद रहे। कलाई…

एवं देहद्वयादन्य आत्मा पुरुष ईश्वरः। सर्वात्मा सर्वरूपश्चसर्वातीतोऽहमव्ययः।।
इस प्रकार आत्मा पुरुष या ईश्वर स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों प्रकार के शरीरों से भिन्न है। अतः मैं सर्वात्मा, सर्वरूप, अविनाशी और सबसे परे हूँ।
~ अपरोक्षानुभूति (श्लोक ४०)
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) शंकराचार्य के श्लोक को उद्धृत किया है, “आत्मा स्थूल…

यत्राज्ञानाद्भवेद्दवैतमितरस्तत्र पश्यति। आत्मत्वेन यदा सर्वं नेतरस्तत्र चाण्वपि।।
“जहाँ अज्ञान से द्वैत-भाव होता है, वहीं कोई और दिखलाई देता है। जब सब आत्मरूप ही दिखाई देता है, तब अन्य कुछ भी नहीं रहता।”
~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ५३)
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि ह्यात्मत्वेन विजानतः। न वै तस्य भवेन्मोहो न च शोकोऽद्वितीयतः।।
“उस अवस्था में सम्पूर्ण…

प्रश्नकर्ता: मुक्ति क्या है? एक तो ये नज़रिया हो सकता है मुक्ति का कि जैसे हम लोग कैम्प में आए हैं, तो यहाँ पर एक पैटर्न है, एक रूटीन है। तो वो रूटीन एक बंधन की तरह लगता है। उससे निकल कर कहीं और कुछ और हम लोगों को कुछ…

आचार्य प्रशांत: हम एक भूत, माने एक पदार्थ की उत्पत्ति का कारण सदा दूसरे पदार्थ को मानते हैं और बात निपटा देते हैं। भूत माने मैटेरियल, भौतिक पदार्थ। जब आप एक भूत की उत्पत्ति का कारण दूसरे भूत को मानते हो और दूसरे की उत्पत्ति की वजह तीसरे को…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने बताया है कि सब सांसारिक विषय मूल में एक ही हैं, बस रूप अलग-अलग हैं। जैसे ख़राब दूध से बनी सभी मिठाइयाँ ख़राब ही होंगी। चाहे रसगुल्ला खाओ, बर्फी खाओ, रसमलाई खाओ सब गंधाएँगी और पेट ख़राब करेंगी। आचार्य जी, कृपया बताएँ कि इस संसार में…

प्रश्नकर्ता: सर, हम पी.एच.डी. कर रहे हैं और जब से अध्यात्म की ओर आए हैं तब से लगता है कि मेरा जो पढ़ाई का विषय है - मैं गणित में पी.एच.डी. कर रही हूँ - इन सबका कोई भी ज्ञान है, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जीवविज्ञान इत्यादि का, उसमें मुझे रुचि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पिछले कुछ सत्रों में कहा कि प्रकृति मुक्ति चाहती है और उसके लिए वो इंसान के शरीर का इस्तेमाल करती है। ये प्रकृति कुछ भी चाह कैसे सकती है?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति का काम है चाहना। अभी तुम यहाँ खड़े हो, तुम्हें कहीं भी कुछ भी…

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये था कि अभी थोड़ी देर पहले जैसा आपने कहा कि मरकर भी तुम्हें इन देहभाव से, जो यह देह का जो बंधन है उससे मुक्ति नहीं मिलेगी, और यही सबसे बड़ा बंधन है और यही पहला बंधन है, और यही सबसे ज़्यादा दुखदाई है, और इससे…

प्रश्नकर्ता: एक सामान्य व्यक्ति की इच्छा होती है कि जीवन में शांति मिले और जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाए। जो मान्यता हम मुक्ति की समझते हैं वो ये है कि जीवन-मरण से मुक्ति मिल जाए।
प्रश्न मेरा ये है कि द्वैतवाद और अद्वैतवाद में कौनसा मार्ग ऐसा है…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी आपने बोला कि मैन इज़ नॉट इन द नेचर, ओनली मैन इज़ डिजाइन्ड फॉर लिबरेशन (मनुष्य प्रकृति में नहीं है, केवल मनुष्य को मुक्ति के लिए बनाया गया है) लेकिन मैन (मनुष्य) का जो शरीर है पूरा वो आया तो प्रकृति से ही है। तो प्रकृति…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार ऐसा होता है कि उलझन आती है तो हम उसे ऑब्ज़र्व (ध्यान से देखना) करते हैं, उसपर सोचते हैं कि क्या उसका सल्यूशन (समाधान) हो सकता है। उस समय लगता है हाँ समझ गया मैं प्रॉब्लम क्या है। उस समय के लिए लगता है समझ…

प्रश्नकर्ता: गुरुदेव, मैं पूछना चाहता हूँ कि कुछ महापुरुष ध्यान साधना करके मुक्ति पाना चाहते हैं, और कुछ आत्मज्ञान होने के बाद भी बार-बार धरती पर आना चाहते हैं दुनिया के सुधार के लिए, ताकि दुनिया उनका अनुसरण कर सके और सुधार हो सके। तो, दोनों में से कौन-सा ठीक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप अपनी किताब में कहते हैं कि ध्यान की विधियों से कुछ नहीं होगा, लेकिन क्या कुछ देर बैठ कर अपने विचारों को देखना सही नहीं है? क्या इससे कुछ पलों का चैन नहीं मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: सटीक उदाहरण नहीं दे रहा हूँ पर इशारा समझना। चुप-चाप…

प्रश्नकर्ता: संसार में फैलने की उक्तियाँ और विधियाँ तो हमें पता पड़ जाती हैं पर ऊपर उठने की कौन सी विधियाँ हैं? वो कौन से प्रैक्टिसेस हैं जिनसे हम अपने को ऊँचा उठा सकें ?
आचार्य प्रशांत: नहीं, प्रैक्टिसेस कोई नहीं है। अपने दर्द का पता होना चाहिए। जब आप…

प्रश्नकर्ता: ध्यान केंद्रित करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
आचार्य: ध्यान केंद्रित कैसे करें। अभी सुन रहे थे तुम?
प्र: जी सर।
आचार्य: ध्यान से सुना?
प्र: जी।
आचार्य: ध्यान से? क्या उसके लिए कोई विधि लगाई ध्यान केंद्रित करने के लिए?
प्र: नहीं, यहाँ पर तो नहीं लगाई…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पहले मैं ध्यान करता था, लेकिन जब से नाईट शिफ्ट (रात की पाली) लगी है, समय नहीं मिल पाता। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारा कैसा ध्यान था कि ध्यान के बावजूद तुम नाईट शिफ्ट में फँस गए बेटा? ये कौन सा ध्यान था जिसने तुम्हें इतना भी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भविष्य में कभी बीमार हुए तो उसके लिए अभी से ही पैसों की व्यवस्था करके रखना होगी न?
आचार्य प्रशांत: बीमारी जब आएगी उसके लिए तुम अभी से बीमारी का जीवन जीना चाहते हो? तुम्हें इतनी घनी और इतनी बड़ी बीमारी आ गयी कि नहीं जी सकते…

प्रश्नकर्ता: एक सवाल था। बेवकूफ़ी वाला है।
आचार्य प्रशांत: बड़ा वाला सवाल है! गम्भीरता देख रहे हो? पहले ही बता देंगे कि बेवकूफ़ी वाला सवाल है।
प्र: आचार्य जी, मैंने किताबें कुछ ज़्यादा पढ़ी नहीं हैं। कहीं से कुछ मिल जाता है तो, कभी कुछ चीजें ध्यान करते हुए अपने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। ओशो ने हमें ध्यान की विधियाँ दी, आप वो भी छीन रहे हैं। अब हम क्या करें?
आचार्य: नहीं, मैं छीन नहीं रहा विधियाँ। मैं कह रहा हूँ कि विधियों को विधियों जितनी ही महत्ता दो, बस। विधि द्वार है। द्वार को द्वार जितनी ही अहमियत…

प्रश्नकर्ता: क्या बीस मिनट का ध्यान करना सही है?
आचार्य प्रशांत: खेल की तरह करो, तो कुछ भी गलत नहीं है। हाँ, तुम ये सोचोगे कि किसी विधि का पालन करके तुम्हें सत्य मिल जाएगा, तो ये बात बेवकूफी की है। सही-गलत नहीं है; बेवकूफी है।
प्र: कैसी विधि से…

आचार्य प्रशांत (आचार्य): ग्रंथों का श्लोक हो, गुरुओं का आप्त वाक्य हो, किसी ज्ञानी का आर्ष वचन हो, कभी भूलना नहीं है कि उसमें कुछ भी आपके ज्ञान की बढ़ोत्तरी के लिए नहीं कह दिया जाता; उसमें कुछ भी इसलिए नहीं कह दिया जाता कि आपको संसार के बारे में…

प्रश्नकर्ता: जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय ये चार अवस्थाएँ क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: इसका जो शास्त्रीय तरीक़ा है बताने का, शुरुआत वहाँ से करेंगे। दस तो मानी गई हैं इंद्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। और उसके अलावा होता है अन्तःकरण। अन्तःकरण क्या? अन्तःकरण चतुष्टय, जिसमें चार आते हैं। कौन…

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥५३ ||
~ अष्टावक्र गीता
अनुवाद: स्थितप्रज्ञ पुरुष महान भोगों में विलास करते हैं, और पर्वतों की गहन गुफाओं में भी प्रवेश करते हैं, किन्तु वे कल्पना बंधन एवं बुद्धि वृत्तियों से मुक्त होते हैं।
आचार्य प्रशांत: हमारे भोग भी छोटे होते हैं। और…

प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असम्वेदनशील क्यों होती है?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति ने ऐसा क्या किया भाई? तुम प्रकृति ही हो, तुम प्रकृति के वो विशिष्ट उत्पाद हो जिसके माध्यम से स्वयं प्रकृति निर्वाण खोज रही है। मैं बार-बार कहता हूँ न कि तुम अहंकार हो; अहंकार कोई…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, विद्या और अविद्या क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: जो जन्म ले वो है अविद्या और जिससे अहम भाव समाप्त हो जाए वो है विद्या। ध्यान से समझेंगे।
देखिए इस पर बड़ा संशय रहा है और बड़े तरीकों से विद्या और अविद्या की परिभाषा करने की कोशिश की गई…

आचार्य प्रशांत: कोई ऐसा नहीं है जो समाप्त हो जाना चाहता हो। बड़ी अजीब बात है ये; कोई आयु हो, कोई वर्ण हो, कोई रंग हो, कोई लिंग हो, कोई देश हो, कोई काल हो - जैसे हम सब के भीतर बने रहने की एक निरंतर अभीप्सा रहती है। कोई…

निर्वासनो निरालंब: स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः । क्षिप्त: संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ।।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २१
अनुवाद: वह वासना, आलंबन, परतंत्रता आदि के बंधनों से स्वच्छंद होता है। प्रारब्ध रूपी वायु के वेग से उसका शरीर उसी प्रकार गतिशील रहता है, जैसे वायु वेग से सूखा पत्ता।
आचार्य प्रशांत:…

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठते सुखम्।।
~अष्टावक्र गीता
अध्याय १८, श्लोक २०
अनुवाद: जो धीर पुरुष है उसका न प्रवृत्ति से, न निवृत्ति से कोई आग्रह होता है। जब जो सामने आ जाता है तब उसे करके वह आनंद से रहता है।
आचार्य प्रशांत:…

क्व मोहः क्व च वा विश्व क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता ।
सर्वसंकल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥
~ अष्टावक्र गीता
( अध्याय १८ श्लोक १४ )
अनुवाद: जो महात्मा समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम कर रहा है, उसके लिए अज्ञान कहां, विश्व कहां, ध्यान कहां और मुक्ति भी कहां?
आचार्य…

कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्।।१३.२।।
अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ(अर्थात् नहीं) हैं, वाणी के दुःख भी कहाँ हैं, वहाँ मन भी कहाँ है, सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ।
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय -१३ , श्लोक…

समस्त कल्पनामात्र - मात्मा मुक्तः सनातनः।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
~ अष्टावक्र गीता
अध्याय १८ श्लोक ७
अनुवाद: सब कुछ कल्पना मात्र है और आत्मा नित्य मुक्त है। धीरपुरुष इस बात को जानकर फिर बालक के समान क्या अभ्यास करे? अर्थात् ज्ञानी के लिए अभ्यास निरर्थक है।
आचार्य…

विहाय वैरिणं कामम-र्थं चानर्थसंकुलं।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रा ना दरं कुरु॥१०- १॥
अनुवाद: जब तक जीवन स्वार्थों के पीछे भाग रहा है, तब तक जीवन में आनंद का होना ना मुमकिन है।
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय - १0, श्लोक – १)
आचार्य प्रशांत: अधर्म को छोड़कर, जो इन दोनों का कारण…

निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि
यच्चित्तं न प्रवर्तते।
निर्निमित्तमिदं किंतु
निर्ध्यायेति विचेष्टते॥१८- ३१॥
~ अष्टावक्र गीता
अनुवाद: जीवन्मुक्त का चित्त ध्यान से विरक्त होने के लिए और व्यवहार करने के लिए प्रवृत्त नहीं होता है। किन्तु निमित्त के शून्य होने पर भी वह ध्यान से विरत भी होता है और व्यवहार भी…

*स्वातंत्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातंत्र्याल्लभते परं। *
स्वातंत्र्यान्निवृतिं गच्छेत्स्वातंत्र्यात् परमं पदम् ॥५०॥
आचार्य प्रशांत: स्वतंत्रता से ही सुख की प्राप्ति होती हैं। स्वतंत्रता से ही परम तत्व की उपलब्धि होती है। स्वतंत्रता से ही परम शांति की प्राप्ति होती है। स्वतंत्रता से ही परम पद मिलता है।
प्रश्नकर्ता: किस स्वतंत्रता की बात…

निःसंगो निष्क्रियोऽसि
त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः।
अयमेव हि ते बन्धः
समाधिमनुतिष्ठति॥१-१५॥
आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ॥15॥
~ अष्टावक्र गीता
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र इस श्लोक में ऐसा क्यों कह रहे हैं कि ध्यान की हर विधि…

प्रश्नकर्ता: जब ध्यान राम के पास नहीं होता, तो उस समय नहीं पता चलता, बाद में होश आता है। कैसे हर पल पता रहे कि ध्यान कहाँ है?
आचार्य प्रशांत: एक छोटी सी कहानी सुनाऊँगा, अच्छा प्रश्न है। मैं कॉलेज में था तो ऐसा बहुत होता था कि जो लोग…

आचार्य प्रशांत: श्लोक संख्या ५ है, प्रथम मुण्डक, द्वितीय खंड से, “जो पुरुष यज्ञ में आहुतियाँ देता है यथासमय, अनुशासन का पालन करता है, उसे सूर्य की किरणें वहाँ ले जाती हैं जहाँ देवताओं का एकमात्र स्वामी इंद्र निवास करता है।“
बात बहुत सीधी है। यज्ञ का अर्थ होता है,…

आचार्य प्रशांत: क्या कर रहे थे आप लोग रात में? शोर मचा रहे थे? लेटा हुआ था मैं, बहुत आवाज़ें आ रही थी। क्या कर रहे थे?
प्रश्नकर्ता: गा रहे थे।
आचार्य: क्या गा रहे थे?
प्र: झीनी रे झीनी चदरिया…
आचार्य: क्या अर्थ है उसका? कौन-सी चादर है? किस…

वो चार अलग-अलग महासागरों और आठ अलग-अलग समुद्रों में तैर चुकी हैं।
स्वर्गीय माननीय भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी जी ने उन्हें वाटर एडवेंचर के लिए तेनज़िंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवार्ड से सम्मानित किया है।
वो अंटार्कटिक जल में खुली तैराकी में रिकॉर्ड स्थापित करने वाली पहली एशियाई महिला और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ओशो कहते हैं, "धर्म का सार है- राम खुमारी।" 'राम खुमारी' क्या है? कृपया प्रकाश डालने की अनुकम्पा करें।
आचार्य प्रशांत: तुम जिसे आमतौर पर होश कहते हो, जब समझ उठती है तो ये होश डगमगाने लगता है। ये झूठा होश है। कुछ वैसा-सा ही मज़ा आने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन के बारे में बहुत बोला जाता है कि मन चंचल है, ये है, वो है, लेकिन अगर हम मूल की बात करें तो मन क्या है, क्या वह बुद्धि है या अहंकार? जब हम पैदा हुए, तब से लेकर अब तक की जो याददाश्त है, वो…

प्रश्नकर्ताः आचार्य जी, मेरा मन हमेशा के लिए किसी एकांत जगह पर जाकर ध्यान साधना और भक्ति में डूबने को करता है लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांतः देखो बेटा, अभी थोड़ी देर पहले ही मैं कह रहा था कि जब घर में आग लगी हो,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यह जो 'मैं' (अहम्) है, जो शरीर की समाप्ति के साथ ही ख़त्म हो जाता है, वह असल में है क्या?
आचार्य प्रशांत: वो एक वृत्ति है। वो एक भटकी हुई वृत्ति है जिसका अपना कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। वो चिपकना भर जानता है। वो इससे …