प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये था कि अभी थोड़ी देर पहले जैसा आपने कहा कि मरकर भी तुम्हें इन देहभाव से, जो यह देह का जो बंधन है उससे मुक्ति नहीं मिलेगी, और यही सबसे बड़ा बंधन है और यही पहला बंधन है, और यही सबसे ज़्यादा दुखदाई है, और इससे मुक्ति का रास्ता है कि परम प्रेम में पड़ जाओ। तो प्रेम में पड़ना तो अपने हाथ में नहीं है, तो परम-प्रेम में तो मैं पड़ नहीं पा रहा हूँ। और फिर मैं मरकर भी मुक्त होना चाहूँ तो आपने बोला कि मर कर भी बंधन कटेंगे नहीं। तो मर कर बंधन क्यों नहीं कटेंगे? और प्रेम में पड़ना हमारे हाथ में नहीं है।
आचार्य प्रशांत: तुम्हारे हाथ में परम-प्रेम में पड़ना नहीं है, पर तुम्हारे हाथ में परम-प्रेम को बाधित करना तो है न? और वहाँ तो तुम अपना हाथ खूब चला रहे हो। परम-प्रेम तो मन की स्वाभाविक दशा है, वो प्यासा है उसे पानी चाहिए, वो उसे तुम्हें सिखाना थोड़े ही पड़ेगा कि परम-प्रेम कैसे करना है। हाँ, तुम ये कर सकते हो कि उसे उल्टी-पुल्टी बातें सब सिखा दो; जैसे अभी कर रहे हो।
प्रेम तुम्हारे हाथ की बात नहीं है और ये गनीमत है कि प्रेम तुम्हारे हाथ की बात नहीं है। प्रेम अनिवार्यता है। प्रेम तो तुम्हें उसी क्षण से है जिस क्षण से तुमने कहा 'मैं'। जब तुमने कहा 'मैं' तभी से तुम प्रेम में पड़ गए। क्योंकि प्रेम का मतलब होता है अपूर्णता, प्रेम का मतलब होता है प्यास, प्रेम का मतलब होता है कुछ पाना है, कुछ आकर्षण है। 'मैं' जैसे ही कहा तुमने वैसे ही अधूरापन खला, बहुत बुरा लगा। 'अहम्' जिसने कहा, तत्काल उसे आत्मा से प्रेम हो गया। अहम् हो ही नहीं सकता बिना आत्मा से प्रेम करे। तो प्रेम में तो तुम हो ही, अब ताज्जुब की बात ये है कि प्रेम में होते हुए भी तुम प्रेम को रोके कैसे हुए हो — वो तुम्हारे हाथ का कमाल है।
जो कुछ भी शुभ-से-शुभ अच्छे-से-अच्छा और ऊँचे-से-ऊँचा हो सकता है, मैं कह रहा हूँ — गनीमत है कि वो अपने होने के लिए तुम पर निर्भर नहीं करता, वो स्वत: ही हो जाता है। लेकिन फिर भी तुम अपना ज़ोर एक जगह तो दिखा ही देते हो, कि जो कुछ शुभ हो रहा होता है उसे तुम बाधित कर देते हो, रोक देते हो।

