समस्त कल्पनामात्र - मात्मा मुक्तः सनातनः।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
~ अष्टावक्र गीता
अध्याय १८ श्लोक ७
अनुवाद: सब कुछ कल्पना मात्र है और आत्मा नित्य मुक्त है। धीरपुरुष इस बात को जानकर फिर बालक के समान क्या अभ्यास करे? अर्थात् ज्ञानी के लिए अभ्यास निरर्थक है।
आचार्य प्रशांत: धीरपुरुष जानता है ये। अब वो क्या ये बचकानी हरकतें करे? क्या अभ्यास कर रहा है? क्या अभ्यास? कैसा अभ्यास? तभी तो अष्टावक्र ऐसे हैं कि मुझे बिल्कुल तरंगायित कर देते हैं, मौज दिला देते हैं। मर रहा हो आदमी उसको अष्टावक्र सुना दें वो भी लहरा जाएगा। लहर खाकर मरेगा। सबकुछ आत्मा मात्र है और आत्मा है नित्य मुक्त धीरपुरुष समझता है ये। अब वो क्या अभ्यास करे। वो क्या कहे कि अभी मैं नैतिकता का अभ्यास करता हूं, विवेक का अभ्यास करता हूं, वैराग्य का अभ्यास करता हूं, साधना करता हूं, तपस्या करता हूं, कुछ नहीं। सब कुछ कल्पना मात्र हैं, सब कुछ मानसिक हैं। जो तुम्हें सुझाई दे, जो तुम्हें सुनाई दे, जो तुम्हें दिखाई दे, जो तुम्हें ना भी दिखाई दे, जो तुम्हें कल्पना में आता हो और जो तुम्हें लगता हो कि कल्पना से परे हो; वो सब मात्र कल्पना है।
जिस कुछ को भी लेकर तुम मन में कोई भी ख्याल बना लेते हो, ये ख्याल भी कि ख्याल नहीं बनाया जा सकता, वो ख्याल भी कल्पना मात्र हैं। आत्मा नित्य मुक्त है उससे खेल लो छुपन-छुपाई। कभी पकड़ ना पाओगे। क्योंकि तुम्हारी उंगलियां कुछ ऐसी है जो मुड़कर के तुम्हें नहीं छू सकती। तुम्हारी आंख कुछ ऐसी है जो मुड़कर के तुम्हें नहीं देख सकती।




