प्रश्नकर्ता: गुरुदेव, मैं पूछना चाहता हूँ कि कुछ महापुरुष ध्यान साधना करके मुक्ति पाना चाहते हैं, और कुछ आत्मज्ञान होने के बाद भी बार-बार धरती पर आना चाहते हैं दुनिया के सुधार के लिए, ताकि दुनिया उनका अनुसरण कर सके और सुधार हो सके। तो, दोनों में से कौन-सा ठीक है? क्या दुनिया के सुधार के लिए दुनिया में बार-बार आना (जन्म लेना) भी बंधन का कारण है?
आचार्य प्रशांत: आपको मुक्ति मिल जाए ये चुनाव करने की कि आना है या नहीं आना है, फिर जो रास्ता आप चुनें वही श्रेष्ठ है आपके लिए। पर पहले वो मुक्ति उपलब्ध तो हो। जो कहते हैं "नहीं आना", वो भी अपनी मुक्ति में कह रहे हैं कि नहीं आना। जो कहते हैं "आना है" वो भी अपनी मुक्ति में कह रहे हैं कि आना है। दोनों में साझी बात क्या है? कि दोनों को ना भ्रम है, ना भय है, ना दबाव है।
आप पहले उस बिंदु तक तो पहुँच जाइए जहाँ ना भय हो, ना भ्रम हो, ना दबाव हो, उसके बाद आप जो करें वही अच्छा।
प्र: लेकिन गुरुदेव, जैसे फिर आ गए धरती पर तो फिर समस्या में फँस जाएँगे वो?
आचार्य: समस्या में वो फँसता है जो किसी भी जगह समस्याग्रस्त होकर के जाता है। समस्या में वो फँसता है जो समस्या में लिप्त होने का इरादा रखता है।
मुक्त पुरुष की पहचान ही यही है कि वो समस्याओं के बीच भी मुक्त है।

