*स्वातंत्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातंत्र्याल्लभते परं। *
स्वातंत्र्यान्निवृतिं गच्छेत्स्वातंत्र्यात् परमं पदम् ॥५०॥
आचार्य प्रशांत: स्वतंत्रता से ही सुख की प्राप्ति होती हैं। स्वतंत्रता से ही परम तत्व की उपलब्धि होती है। स्वतंत्रता से ही परम शांति की प्राप्ति होती है। स्वतंत्रता से ही परम पद मिलता है।
प्रश्नकर्ता: किस स्वतंत्रता की बात की जा रही है और उसे कैसे समझें?
आचार्य: वही निरालंबित रहना। कुछ तो हो आपके पास ऐसा जो निरपेक्ष हो। जो किसी अन्य पर निर्भर ना हो। जिसका वजूद किसी दूसरी चीज का गुलाम ना हो। वो आपके पास है जहां इसमें आप निश्चित हो गए वहां वह सब मिल जाता है जो वर्णित है।
कुछ है आपके पास ऐसा जो कि किसी भी अन्य वस्तु, व्यक्ति, विचार, घटना, होनी-अनहोनी पर निर्भर ना करता हो। शरीर है आपके पास, शरीर आपका क्या निर्भर नहीं करता तमाम स्थितियों पर? अभी इस कमरे का तापमान 500 डिग्री सेल्सियस हो जाए, शरीर रहेगा? खुशी है आपके पास क्या आपके पास वह खुशी है जो किसी भी स्थिति, वस्तु, व्यक्ति, विचार पर निर्भर ना करती हो। क्या आपके पास वह धन है जो किसी घटना पर निर्भर ना करता हो। धन तो बहुत था, नवंबर के महीने में बहुतो का धन खत्म हो गया।





