
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.


आचार्य प्रशांत: मुक्ति तो हो ही जानी है। जो हाथ आपको मुक्त करने के लिए आ रहा है, वो आपकी इच्छा की प्रतीक्षा नहीं करेगा, आपकी सहमति का इंतज़ार करता नहीं बैठेगा, हो जाएगा। पर आप ज़रा सुविधा दें, आप ज़रा स्वीकृति दें तो काम जल्दी बन सकता है। आरम्भ…

आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कठोपनिषद्, तृतीय वल्ली, श्लोक क्रमांक चौदह। "उपनिषद्कार कहते हैं कि सत्य छुरे की धार जैसा है, 'क्षुरस्य धारा'।" तो पूछ रही हैं कि, "जो ध्यानस्थ हो, उसके लिए तो सत्य सहज और सरल भी है। तो, क्यों उसको छुरे की धार जैसा कहा जा रहा…

“जो यज्ञ करने वालों के लिए सेतु के समान है, उस नाचिकेत अग्नि को, तथा जो भय शून्य है और संसार को पार करने की इच्छा वालों का परम आश्रय है, उस अक्षर ब्रह्म को जानने में हम समर्थ हों।” ~(कठोपनिषद, प्रथम अध्याय, तृतीय वल्ली, श्लोक २)
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…

प्रश्नकर्ता: नचिकेता को तो मौत के पास उनके पिता ने भेजा। क्या संभव है कि किसी माध्यम के बिना मौत तक पहुँचा जाए, मौत का सामना किया जाए?
आचार्य प्रशांत: कितनी भोली हैं आप। कह यूँ रही हैं जैसे मौत कोई दूर की कौड़ी हो। पूछ रही हैं, "क्या संभव…

आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कठोपनिषद, द्वितीय अध्याय की द्वितीय वल्ली, श्लोक संख्या पंद्रह पर देवेश (प्रश्नकर्ता) जिज्ञासा कर रहे हैं। कह रहे हैं कि, "इस श्लोक में ऐसा लग रहा है जैसे परम अवस्था, ब्राह्मी अवस्था एक गहरी नींद है जहाँ कुछ भी चेतना में नहीं है, और उससे…

आचार्य प्रशांत: एक पिछले सत्र में, मैंने गुफ़ाओं और दर्पणों की बात करी थी। मैंने कहा था कि "सत्य के साधक का कर्तव्य होता है कि वो अपने जीवन को दर्पणों से भर ले, वो अपने-आपको अपने हक़ीक़त के इतने साक्ष्य दे कि उसके लिए न बदलना असंभव हो जाए।…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, एक द्वैत है जो मुझमें लगातार बना रहता है, सदैव डरा रहता है, मुझे बचाए रखना चाहता है। मेरी जितनी भी संपदा है उसे भी बचाना चाहता है। घबराता है कि मेरी मृत्यु के पश्चात मेरे परिवार का क्या होगा। और दूसरा भी एक हिस्सा है…

प्रश्नकर्ता: जब ध्यान राम के पास नहीं होता, तो उस समय नहीं पता चलता, बाद में होश आता है। कैसे हर पल पता रहे कि ध्यान कहाँ है?
आचार्य प्रशांत: एक छोटी सी कहानी सुनाऊँगा, अच्छा प्रश्न है। मैं कॉलेज में था तो ऐसा बहुत होता था कि जो लोग…

प्रश्नकर्ता: मौत के सामने खड़े होने का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: मृत्यु से बात करने का अर्थ क्या है? पर जबतक हम ये समझ नहीं रहें हैं तब तक हम नहीं समझेंगे क्योंकि बाकी सारे काम तो अपने आप हो ही जाएँगे। एक बार आप यम के सामने खड़े…

प्रश्नकर्ता:
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूस्वाम।।

आचार्य प्रशांत: प्रश्नकर्ता पूछते हैं, "आचार्य जी, प्रणाम। कई बार ये प्रश्न मेरे मन में उठता है, आज के सूत्रों से फिर उठ बैठा।" सूत्र संख्या लिखी नहीं। आगे कहते हैं, "हमारी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं, ये तो तथ्य है, इनका मूल स्त्रोत परमात्मा है, ये भी ठीक, और इन्द्रियों के…

यदिदं किं च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम्।
महद् भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।।
(कठोपनिषद, अध्याय 2, वल्ली 3, श्लोक 2)

प्रश्न: उपनिषद् भी कहते हैं *“*एकोहम् बहुष्यामि”
तो क्या ये जो कल्पना होती है, वो इश्वर के मन में होती है कि, ‘’मैं एक हूँ, और बहुत हो जाऊं?’’
वक्ता:ये उसके मन में होती है जिसे बहुत दिख रहे हैं। इश्वर न बहुत है न एक है; जब


◾ एक ही जाति होती है - वह है "बल"। बल विकसित करो अपने भीतर।
◾ आत्मा का इस पूरे देह व्यापार से कोई लेना देना ही नहीं।

अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
~ कठ उपनिषद् (1.2.23)
यह आत्मा…
◾ आत्मा का विकृत सिद्धांत ही भारत की दुर्दशा…
अनुवाद: जब तक 'मैं' या 'मेरा' का भाव है तब तक बंधन है, जब 'मैं' या 'मेरा' का भाव नहीं है तब मुक्ति है। यह जानकर न कुछ त्याग करो और न कुछ ग्रहण ही…

लड़कीवाले लड़की देने को राज़ी नहीं होते अगर सरकारी नौकरी नहीं है। और कोई वजह हो-न-हो, वंश चलाने की ख़ातिर हमें यूपीएससी निकालना पड़ेगा। ‘वंश चलाने के लिए यूपीएससी निकालना पड़ेगा!’ यह सब तो तुम्हारे सारे कारण हैं सरकारी नौकरी के पीछे जाने के, नहीं तो और तुम क्यों इतने…

सबसे पहले यह समझो कि दूसरे तुम में कमज़ोरी देख रहे हैं न, इसीलिए तुम पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वह तुममे कमज़ोरी देखेंगे ही नहीं तो तुम पर चढ़ने की कोशिश भी नहीं करेंगे। बात यह नहीं है कि उसने जो भी कहा है वह सही…

ना संसार से डरो, ना सरकार से डरो, ना डरो दुनिया के तानों से, ना डरो अधूरे अरमानों से, डरो तो बस ज़िंदगी के बर्बाद चले जाने से। घड़ी की टिक-टिक को अपना दोस्त बना लो, हर घण्टे-दो- घण्टे पूछा करो अपने-आप से, “अपने समय का जो मैं ऊँचे-से-ऊँचा, बढ़िया-से-बढ़िया…

पढ़ाई में मन नहीं लगता क्योंकि वो पढ़ाई शायद तुम्हारे लिए है ही नहीं। वो पढ़ाई तुम कर ही रहे हो उनके दबाव में जो तुमको एक तरह से स्पॉन्सर कर रहे हैं कि ‘तू घर बैठ, तुझे रोटी-पानी की फ़िक्र करने की अभी कोई ज़रूरत नहीं साल-दो-साल, तू बैठ…

दुनिया में एक-से-बढ़कर-एक प्रकाशित स्त्रियाँ हुईं हैं, जाओ उन्हें चाहो, बिलकुल उनके प्रेम में पड़ जाओ, न्योछावर हो जाओ उनपर, तुम्हारी ज़िंदगी बन जाएगी। पर तुम ऐसा करते नहीं। ऊँची स्त्रियों से तुम्हें भय लगता है, क्योंकि ऊँची स्त्री के पास जाकर के तुम अपना बौनापन बरक़रार नहीं रख सकते।…

दुनिया की ताक़तों से, और घरवालों से, और पचास लोगों से डरते हो इस बात से भी तो डरो कि, ‘जन्म ही व्यर्थ हो गया तो?’
जीवन से छोटे-मोटे डर सब हटाने हों तो बड़ा डर ले आओ। और बड़ा डर यही है – कल्पना में तो खोए ही रहते…

अकसर जो नंगा होता जाता है उसको हम लिख देते हैं, “ये तो बोल्ड (निर्भीक) कपड़ों में आया है।“ उसमें बोल्डनेस (निर्भीकता) क्या है? फिर तो सबसे बोल्ड जानवर हुए। एक गधा तो बोल्डनेस की प्रतिमूर्ति हो गया, उसे बोल्डनेस का नोबेल प्राइज़ मिलना चाहिए, उसने ज़िन्दगी में कोई कपड़ा…

सेक्स अगर तुम्हें शांत कर सकता होता, दो बार, चार बार में कर गया होता न? यहाँ तो लोग अपने जीवन काल में हज़ारों बार कर जाते हैं और उसके बाद भी लालायित रहते हैं, प्यास ही नहीं बुझती।
अधेड़ हो गए, साठ के हो गए, अस्सी के हो गए,…

एक ज़िंदगी है, दबे-दबे जीने में क्या मज़ा है भाई? तुम किस चीज़ को सुरक्षित कर रहे हो? जीवन माने समय ही तो होता है न? डरे-डरे समय बिता रहे हो, तो तुमने सुरक्षित किस चीज़ को रख लिया है? समय डर में बिता दिया तो तुमने बचा क्या लिया?…

जो आपको डराने आए, वो आपको छोटी धमकी देता है। उसको आप कहिए, “तू आ कर बैठ! तू तो छोटी धमकी दे रहा है, मुझे तो पूरी बात पता है।“ पूरी बात क्या? यहाँ से एक पैसा और शरीर की एक कोशिका ले कर के हम बचने नहीं वाले, बाहर…

डिप्रेशन तब तक नहीं हो सकता जब तक अपने-आप को बहुत मजबूर अनुभव ना करो । और मजबूर हम नहीं होते, मजबूर हमें हमारी अंधी कामनाएँ बनाती हैं। अन्यथा कोई मजबूर नहीं है। कामनाओं में भी कोई दिक़्क़त नहीं है, अगर वो अंधी ना हों। कुछ ऐसा माँग रहे हो…

तुम्हें क्या लगता है नर्क वो जगह है जहाँ बड़े-बड़े कड़ाहों में तेल उबल रहा है और लोग उसमें पकौड़ो की तरह तले जा रहे हैं? ना! नर्क वो जगह है जहाँ सब खूब मेहनत करते हैं, कमाते हैं, खाते हैं और सो जाते हैं। नर्क बड़ी साफ़-सुथरी जगह है…

प्रश्नकर्ता: मुक्ति क्या है? एक तो ये नज़रिया हो सकता है मुक्ति का कि जैसे हम लोग कैम्प में आए हैं, तो यहाँ पर एक पैटर्न है, एक रूटीन है। तो वो रूटीन एक बंधन की तरह लगता है। उससे निकल कर कहीं और कुछ और हम लोगों को कुछ…

प्रश्नकर्ता: हमारे मन का स्तर उठता क्यों नहीं? हम बेहतर होना चाहते हैं, पर चाहते हुए भी बेहतर हो क्यों नहीं पाते?
आचार्य प्रशांत: देखिए जो ये शब्द होता है न 'चाहना', ये थोड़ा भ्रामक शब्द है। हम साफ़-साफ़ जानते नहीं हैं कि हम चाहते क्या हैं। आप पूछेंगे तो…

प्रश्नकर्ता: सर, हम पी.एच.डी. कर रहे हैं और जब से अध्यात्म की ओर आए हैं तब से लगता है कि मेरा जो पढ़ाई का विषय है - मैं गणित में पी.एच.डी. कर रही हूँ - इन सबका कोई भी ज्ञान है, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जीवविज्ञान इत्यादि का, उसमें मुझे रुचि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पिछले कुछ सत्रों में कहा कि प्रकृति मुक्ति चाहती है और उसके लिए वो इंसान के शरीर का इस्तेमाल करती है। ये प्रकृति कुछ भी चाह कैसे सकती है?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति का काम है चाहना। अभी तुम यहाँ खड़े हो, तुम्हें कहीं भी कुछ भी…

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये था कि अभी थोड़ी देर पहले जैसा आपने कहा कि मरकर भी तुम्हें इन देहभाव से, जो यह देह का जो बंधन है उससे मुक्ति नहीं मिलेगी, और यही सबसे बड़ा बंधन है और यही पहला बंधन है, और यही सबसे ज़्यादा दुखदाई है, और इससे…

प्रश्नकर्ता: एक सामान्य व्यक्ति की इच्छा होती है कि जीवन में शांति मिले और जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाए। जो मान्यता हम मुक्ति की समझते हैं वो ये है कि जीवन-मरण से मुक्ति मिल जाए।
प्रश्न मेरा ये है कि द्वैतवाद और अद्वैतवाद में कौनसा मार्ग ऐसा है…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में कुछ-न-कुछ कहानियाँ सुनते रहते हैं, आखिर मृत्यु के बाद क्या होता है?
आचार्य प्रशांत: पहेली है ये, कुछ है ही नहीं मृत्यु के बाद। संसार ही नहीं है, तुम्हारे ही देखे संसार है तुम्हारे ही देखे समय है।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी आपने बोला कि मैन इज़ नॉट इन द नेचर, ओनली मैन इज़ डिजाइन्ड फॉर लिबरेशन (मनुष्य प्रकृति में नहीं है, केवल मनुष्य को मुक्ति के लिए बनाया गया है) लेकिन मैन (मनुष्य) का जो शरीर है पूरा वो आया तो प्रकृति से ही है। तो प्रकृति…

दुर्लभ मानुष जन्म है, मिले न बारम्बार। तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।।
~ कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: सत्य की साधना में यह मनुष्य का शरीर ही अवरोध बनती है तो इसे ही दुर्लभ क्यों कहा गया है?
आचार्य प्रशांत: मैं सवाल समझा देता हूँ सबको। कह रहे हैं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आपका एक वीडियो देखा जिसमें आप बता रहे थे कि शरीर की औकात राख भर की है। ये तो हमें भी पता है कि एक दिन मरना है। पर मौत के डर से क्या जीवन का आनंद लेना छोड़ दिया जाए?
आचार्य प्रशांत: अरे नहीं, क्या…

प्रश्नकर्ता: आपके वीडियोज़ देख कर समझ आ गया है कि अगर निर्भरता न हो तो डर नहीं आता। किसी भी उपलब्धि को गंभीरता से ना लिया जाए तो डर नहीं होता और डर हटाने के बाद मन को कुछ अच्छा देना होता है। यह छोटे-मोटे डर को पार करना आसान…

प्रश्नकर्ता: मेरा एक दोस्त है वो ये भूत-प्रेत वगैरह सब में बहुत ज़्यादा विश्वास करता है। हालाँकि पढ़ा-लिखा है वेल एजुकेटेड है लेकिन पता नहीं क्यों ऐसा है। तो बहुत उससे डिस्कशन (चर्चा) हुआ, काफ़ी सारे लॉजिक (तर्क) उसने भी दिए। मैंने कहा — भई मैंने तो कभी नहीं देखे,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ मुद्दे हैं जिनपर आप पिछले दस साल से बोल रहे हैं, जैसे — आत्मा, चेतना, मन, मृत्यु, पुनर्जन्म। हाल ही में बातचीत सीरीज़ (श्रंखला) के माध्यम से आपने इनपर स्पष्टता भी दी है, फिर भी कई लोग हैं जो एक ही सवाल बार-बार घुमाकर अन्य तमाम…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपके हज़ारों वीडियोस हैं यूट्यूब पर, हर वीडियो में आपने किसी-न-किसी तरीके से धर्म या अध्यात्म की ही बात करी है — उपनिषद्, ब्रह्म, धर्म, अध्यात्म, भगवान। ये सब मिलकर भी दुनिया में जो इतना पाप, दु:ख, युद्ध, क्लेश, अवसाद, बलात्कार, हत्या इत्यादि है उसका आजतक खात्मा…

प्रश्नकर्ता: मेरी उम्र तैंतीस वर्ष है, और मैं एक नामी आईटी कंपनी में इंजीनियर हूँ। कोरोना काल में आपकी वीडियोज़ सुनना अधिक बढ़ गया। सर, आज से तीन साल पहले अचानक मेरी नौकरी छूटी थी। उसके तीन महीने बाद सब ठीक भी हो गया था। परंतु उस घटना ने मुझे…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, गहरे रिवेंजफुल यानि प्रतिहिंसा से भरे हुए विचारों से मुक्ति कैसे पाएँ? बहुत सारी ऐसी भावनाएँ हैं जो हम प्रकट नहीं कर सकते लेकिन वो बहुत पुरानी हैं, उनमें बड़ी जान है।
आचार्य प्रशांत: बदले की भावना। बार-बार याद आना कि अतीत में किसी ने हमारे साथ…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे ऐसा लगता है कि मेरे अंदर जो डर है, पहले मुझे उसका सामना करना पड़ेगा, तो ही मैं मुक्त हो पाऊँगा। क्या यह मेरी धारणा है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, हिम्मत के पास हमेशा एक तर्क होता है, और डर के पास भी हमेशा एक तर्क होता…

आचार्य प्रशांत: दबाव तो आप तभी बर्दाश्त करते हो जब उसमें मुनाफा दिख रहा हो। मुनाफा जिसको चाहिए वो वही है जो सोचता है कि अभी कुछ कमी है।
सत्र के आरंभ में ही हमने कहा था कि अहंता की परिभाषा ही यही है कि वो हमेशा कुछ-न-कुछ कम पाती…

आचार्य प्रशांत: परेश को अक्सर लगता है कि कोई उसे चेक कर रहा है, और ये चीज़ उसे असहज कर देती है।
छोटे बच्चों की क्लास होती है, छोटे बच्चे; उनकी टीचर सामने बैठती है उनकी कॉपी वगैरह ले कर के। उनके भी एग्जाम (परीक्षा) के पेपर होते हैं, वह…

प्रश्नकर्ता: मुझ से अतीत में अज्ञानवश कुछ ऐसे कर्म हुए हैं जो आज मुझे गलत लगते हैं व ग्लानि देते हैं। सकाम कर्म नहीं हुआ है इंडिरेक्टली (परोक्ष रूप से) हुआ है। मुझे इस ग्लानि से कैसे मुक्ति मिले? वो ग्लानि झूठ है ये तो अज्ञानी मन नहीं मानता। वो…