आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कठोपनिषद, द्वितीय अध्याय की द्वितीय वल्ली, श्लोक संख्या पंद्रह पर देवेश (प्रश्नकर्ता) जिज्ञासा कर रहे हैं। कह रहे हैं कि, "इस श्लोक में ऐसा लग रहा है जैसे परम अवस्था, ब्राह्मी अवस्था एक गहरी नींद है जहाँ कुछ भी चेतना में नहीं है, और उससे पूर्व के श्लोक क्रमांक चौदह में अलौकिक आनंद की बात हो रही है।" तो कह रहे हैं कि, “सिद्धांततः ये बहुत बार सुना है कि यह अलौकिक आनंद अनुभव और चेतना के पार है। पर ये बात समझ नहीं पाता कि यदि चेतना नहीं है तो आनंद होता कहाँ है?”
आचार्य: आनंद चेतना की कोई पृथक या विशिष्ट अवस्था नहीं है। किसी एक ख़ास अवस्था पर उंगली रखकर आप नहीं कह पाएँगे कि, "ये आनंद की अवस्था है, इस अवस्था में व्यक्ति आनंदित है।"
आनंद ऐसा है जैसे शर्बत में शक्कर। आप कहाँ कहेंगे कि, "शक्कर है"?
ज्यों मेहंदी के पात्र में लाली लखी न जाए।
हर अवस्था के प्रति एक निर्लिप्तता। हर अवस्था के पीछे एक शांति। हर अवस्था के पीछे स्थिरता। ये सब आनंद युक्त अवस्थाएँ हैं। शांति स्वयं तो कोई अवस्था होती नहीं, स्थिरता स्वयं तो कोई अवस्था होती नहीं। ध्यान से समझिएगा, अनुभव हमेशा अस्थिर का ही होता है, जो स्थिर है उसका अनुभव नहीं हो पाएगा। अनुभव होने की शर्त ये है कि कहीं कुछ बदले, कुछ गति हो, तो आपको पता चलेगा।
एक छोटा सा प्रयोग करके देख लें। इस कमरे में सभी दीवारें स्थिर हैं, आपको उनका कुछ विशेष पता नहीं चल रहा होगा। एक दीवार ज़रा-सी हिलने लगे, आपको उसका पूरा अनुभव होने लगेगा। आकाश का अनुभव नहीं होता, उस पर बादल तैरते रहते हैं उनका अनुभव हो जाता है। आप रेल में बैठे हैं, आपके बगल में एक और रेल खड़ी है, आपको अनुभव नहीं होगा उसका, वो चल पड़े तो आपको अनुभव हो जाता है।

