दुर्लभ मानुष जन्म है, मिले न बारम्बार। तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।।
~ कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: सत्य की साधना में यह मनुष्य का शरीर ही अवरोध बनती है तो इसे ही दुर्लभ क्यों कहा गया है?
आचार्य प्रशांत: मैं सवाल समझा देता हूँ सबको। कह रहे हैं कि एक तरफ़ तो संतजन हमको ख़ूब चढ़ाते हैं। कहते हैं, "मानुष जन्म मिला है तुमको, बड़ी नियामत है, बड़ा वरदान है, बड़ा अवसर है, चूक मत जाना। आदमी का जन्म सबसे ऊँचा जन्म होता है। चौरासी लाख यौनियों में आदमी की ही योनि अकेली है जिसमें जन्म लेने पर मुक्ति संभव हो पाती है।"
"तो एक तरफ़ तो हमसे ये सब बातें कही जाती हैं कि मनुष्य जन्म मिला है तो अब भरपूर उपयोग करो, मौका मत गँवा देना। और दूसरी ओर बहुत लोग, ख़ासतौर पर आचार्य जी आप बताते हैं कि आदमी बिलकुल पशु है। हज़ार तरह के विकार और वृत्तियाँ उसमें जड़ जमाए बैठी हुई हैं। तो आदमी की हालत जब इतनी ही ख़राब है, जैसा कि आप कहते हैं कि जंगल से ताज़ा-ताज़ा गोरिल्ला निकला है सूट-पैन्ट में, तो फिर संतों ने क्यों कहा कि मनुष्य जन्म मिलना बड़े भाग्य की बात है, क्यों कहा उन्होंने?"
इसलिए कहा क्योंकि आदमी अकेला गोरिल्ला है जो अपने गोरिल्ला होने को लेकर के ख़फ़ा है, बेचैन है। इसमें तो कोई शक़ ही नहीं कि आदमी भरपूर गोरिल्ला है। और गोरिल्ला तो बेचारा बहुत मासूम होता है। आदमी बड़ा हिंसक, बड़ा नुक़सानदेह गोरिल्ला है क्योंकि आदमी के पास क्या है? बुद्धि, इंटेलैक्ट जो गोरिल्ले के पास नहीं है। आदमी के पास क्षमता है,

