प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, एक द्वैत है जो मुझमें लगातार बना रहता है, सदैव डरा रहता है, मुझे बचाए रखना चाहता है। मेरी जितनी भी संपदा है उसे भी बचाना चाहता है। घबराता है कि मेरी मृत्यु के पश्चात मेरे परिवार का क्या होगा। और दूसरा भी एक हिस्सा है जो उदासीन और असंवेदनशील है मृत्यु के प्रति। वो हिस्सा कोई ज़िम्मेदारी मानता नहीं क्योंकि वो जानता है कि स्थितियों को काबू नहीं किया जा सकता। आचार्य जी, कौन-सा हिस्सा सच्चा है? मैं किसके साथ रहूँ?
आचार्य प्रशांत: हम जिन्हें अपने ऊपर आश्रित मानते हैं, वो हमारे ऊपर बहुत कम आश्रित हैं। ज़रा तथ्यों का निरीक्षण करें। वो हम पर जितने आश्रित हैं, बहुत संभव है कि उससे ज़्यादा तो हम उन पर आश्रित हों।
माँ-बाप को अक्सर झटका लग जाता है। बच्चे को बच्चा समझ रहे थे, सोचते थे, "ये तो छोटा-सा है; हम इसे खिलाएँ नहीं तो खाएगा नहीं, हम इसे घूमाएँ नहीं तो घूमेगा नहीं, हम इसे बताएँ नहीं तो जानेगा नहीं।" पता भी नहीं था कि उनके पीठ पीछे बच्चा बड़ा हो गया था बिना उनकी मदद के, बिना उनके संज्ञान के। एक दिन बाज़ार जाते हैं तो देखते हैं बच्चा दोस्तों के साथ घूम रहा है, और ऐसी-ऐसी दुकानों में घूम रहा है जिनका ज्ञान उसे माँ-बाप ने तो कभी दिया नहीं; वयस्कों के गीत गा रहा है, वयस्कों-सी बातें, वयस्कों से कपड़े। फिर हमें झटका लग जाता है, हमें ठेस लग जाती है।
मैं आपको आश्वस्त करके बताता हूँ, दुनिया में कोई माँ, कोई बाप नहीं हैं जिसे वास्तव में पता हो कि उसका बच्चा कितना बड़ा हो गया है। माँ-बाप के लिए नुन्नू रह जाता है, और बच्चा गुल खिला आता है। अक्सर अविश्वसनीय लगता है जब खबर पहुँचती है घर। कहते हैं, "ये तो छोटा-सा है, इसने कैसे कर दिया? ये तो हम पर आश्रित है। ये तो एक कमरे से दूसरे कमरे नहीं जा पाता, ये उस मुहल्ले कैसे पहुँच गया?"
तुम्हारे अहंकार को पोषण मिलता था ये सोच-सोच के कि कोई तुम पर आश्रित है। कितनी अकड़ है न इस बात में? और लोग आते हैं और इसी बात का खूब हवाला देते हैं। "देखिये साहब, अभी मैं कोई काम नहीं कर सकती, मेरा एक छोटा-सा बेटा और एक छोटा-सा पति है; वो मुझपर आश्रित हैं दोनों। हाँ, दोनों की हरकतें एक जैसी ही हैं बिल्कुल। वो भी मेरे बिना नहीं खाता, ये भी मेरे बिना नहीं खाते; वो भी मेरे बिना नहीं सोता, ये भी मेरे बिना नहीं सोते।" और अभी तुम्हें पता चलेगा कि दोनों खूब सोना जानते हैं, खटिया तोड़ सुअक्कड़ हैं। फिर पाँव तले से ज़मीन खिसक जाती है। पर कितनी अकड़ है ये मानने में कि मैं न होऊँ, तो दुनिया चलेगी कैसे? मैं न होऊँ, तो दुनिया चलेगी कैसे?

