इच्छा अपूर्ण, मौज पूर्ण || आचार्य प्रशांत, उपनिषद् पर (2014)

प्रश्न: उपनिषद् भी कहते हैं *“*एकोहम् बहुष्यामि”
तो क्या ये जो कल्पना होती है, वो इश्वर के मन में होती है कि, ‘’मैं एक हूँ, और बहुत हो जाऊं?’’
वक्ता:ये उसके मन में होती है जिसे बहुत दिख रहे हैं। इश्वर न बहुत है न एक है; जब हम कहते हैं कि इश्वर कह रहा है कि, “हूँ एक और बहुत हो जाऊं”, तो हमने पहले ही गिनतियों की दुनिया में प्रवेश कर लिया है – एक और बहुत; ये संख्याएँ हैं, ये गिनतियाँ हैं। ये गिनतियाँ कहाँ हैं? कहने वाले के मन में और ये वही बोल सकता है, जो पहले ही गिनतियों की दुनिया में आ चुका है।
गिनतियों की दुनिया में आया हुआ मन उसके विषय में कल्पना करने की कोशिश कर रहा है, जो संख्यातीत है। ये जो अभी आपने वक्तव्य बोला, ये कुछ भी नहीं है मात्र कल्पना है मन की, मनातीत के बारे में। चाहें ‘कुन-फ़ाया-कुन’ हो, चाहें तैत्रिय उपनिषद् का 2.6, चाहें बाइबिल का वक्तव्य *प्रकाश हो*” ये क्या सत्य हैं? ये क्या सत्य हैं? ये जो वक्तव्य हैं कि “उसने कहा कि मैं कई हो जाऊं और वो हो गया है” ये वक्तव्य का सत्य हैं? क्या सत्य आकर इसकी उद्घोषणा कर रहा है कि, ‘मैंने कहा कि मैं कई हो जाऊं’? ये कौन कह रहा है?
ये हमारे-आपके जैसे लोग कह रहे हैं। हम अपने सीमित मन का प्रयोग करके किसी प्रकार असीम को जानने की चेष्टा कर रहे हैं; सत्य नहीं कहने आता कि, ”एक हूँ, कई हो जाऊं,” न उसके पास भाषा है या यूँ कहिये कि उसे भाषा की आवश्यकता नहीं है और न उसके पास गिनती है या यूँ कहिये कि उसको गिनती की आवश्यकता ही नहीं है। ये तो हमारी भाषा है, हमारी कल्पना है।


