प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे ऐसा लगता है कि मेरे अंदर जो डर है, पहले मुझे उसका सामना करना पड़ेगा, तो ही मैं मुक्त हो पाऊँगा। क्या यह मेरी धारणा है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, हिम्मत के पास हमेशा एक तर्क होता है, और डर के पास भी हमेशा एक तर्क होता है। जिसका तर्क जीतता है, वो जीत जाता है।
तो आपकी हिम्मत के पास तर्क तो है। तर्क क्या है, कि डर से मुक्ति चाहिए। डर से मुक्ति चाहिए, इस तर्क के साथ हिम्मत करते हो आगे बढ़ने की। लेकिन बंधनों के पास भी खूब तर्क होते हैं, वो तर्क क्या है, उसकी चर्चा करो।
'पार' की बहुत समझ नहीं भी हो तो भी कम-से-कम इस लोक के ही तर्क ठीक से लगाओ। जो चाहिए उसके विपरीत को पकड़े रहोगे तो संसार में भी कुछ नहीं मिलता, कहीं और क्या मिलेगा। तुम्हारी ज़िन्दगी में ही डर भरा हुआ है न? डर से. जब कहते हो, मुक्ति चाहिए, तो यही कह रहे हो कि जैसी ज़िन्दगी चल रही है वैसी नहीं चाहिए। दोहराओ मेरे साथ। डर कहाँ मौजूद है? रसोई के किसी डब्बे में रक्खा हुआ है? दालान के किसी गमले में रक्खा हुआ है? बैंक खाते में रक्खा हुआ है? जेब में रक्खा हुआ है? डर कहाँ है? ज़िन्दगी में डर है न?
ये जो प्रतिदिन जीवन जी रहे हो यही डर से लथपथ है न? तो जब कहते हो, “डर हटाना है“, तो डर माने क्या? डर कोई वस्तु है कि हटा दोगे? साँस-साँस में डर है, विचार-विचार में डर है, धड़कन में डर है, सपनों में डर है, रिश्तों में डर है, कर्मों में डर है। डर यहीं मौजूद है न? या डर सिर्फ़ कोई सिद्धांत है, कोई एब्सट्रेक्शन है? डर क्या है, तुम्हारी जीती-जागती हकीकत, या कोई किताबी सिद्धांत? जीती-जागती हकीकत है न? वो इतनी जीती-जागती है जैसे कोई इंसान। इंसान को कहते हो न, “ ये ज़िंदा है”, तो डर भी उसी तरह से ज़िंदा है। इंसान का चेहरा देखा है कभी? तो क्या तुमने डर का चेहरा नहीं देखा? जैसे इंसान का चेहरा जानते हो, वैसे ही क्या तुम डर का चेहरा नहीं जानते? और अगर नहीं जानते डर का चेहरा, तो किसी की शक्ल देखते ही कैसे कह देते हो, “ये तो डरा हुआ है”?

