

राम तजूं पर गुरू ना विसारुं।
गुरू के सम हरि को ना निहारूं॥
~ सहजोबाई

जगत तरैया भोर की, सहजो ठहरत नाहि। जैसे मोती ओस की, पानी अंजुली माहि।। – सहजो बाई
वक्ता: अभी कबीर को पढ़ रहे थे तो लिखा था कि राम नहीं है, साधु ही है, जगत ही है। और यहाँ सहजो क्या कह रहीं हैं? कि जगत है जैसे भोर का
वक्ता: इसलिए दिया गया है क्योंकि राम तुम्हारे लिए बस नाम है। हाँ? राम तुम्हारे लिए बस नाम है। गुरु तो फिर भी…

लड़की को पढ़ाई के लिए दो-सौ किलोमीटर दूर भेजना हो तो यही माँ-बाप और भाई कन्नी काट जाते हैं, और ब्याह कर वो दो-हज़ार किलोमीटर दूर जा रही हो इन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। और पढ़ाई के लिए जाएगी तो किसी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहेगी, सुरक्षा में रहेगी, हॉस्टल…

अब देखिएगा, क्या हो रहा है। कोई कृतज्ञ कब अनुभव करेगा? जब पहले उसकी हालत ख़राब हो और कोई बचाए। आपके भीतर अभी यह इच्छा शेष है कि आप कृतज्ञ अनुभव करती रहें और कृतज्ञता अनुभव करने के लिए ज़रूरी है कि कुछ गड़बड़ हो और फिर उस गड़बड़ से आप उबार ली जाएँ। तो फिर आप कृतज्ञ अनुभव करेंगी कि, अरे, मेरा सौभाग्य कि मुझे किसी ने बचा लिया।

जो कुछ बाहर से आ रहा है, वो भाग्य के अधीन है, उस पर आपका कोई नियंत्रण नहीं। सुख-दुःख, लाभ-हानि, जन्म-मरण — सब संयोग हैं। ये इसलिए बताया गया है ताकि आप इन पर नियंत्रण करने की व्यर्थ कोशिश छोड़ दें। जिस पर नियंत्रण किया ही नहीं जा सकता, उसे नियंत्रित करने में ऊर्जा और समय व्यर्थ करेंगे। इस झूठी सुरक्षा भावना से बचें और अपनी ऊर्जा वहीं लगाएँ जहाँ वह सच में फलदायी हो सकती है।


उन्होंने भारतीय स्त्रियों को दयनीय स्थिति से बाहर निकालने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर व्यक्ति दृढ़ निश्चय कर ले तो गरीबी, अभाव, व दुर्दशा की स्थिति पर विजय प्राप्त करके वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है।…

आज ही के दिन, 22 अगस्त 1907 को जर्मनी में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में इन्होंने भारत का झंडा फहराया था।
आज़ादी से 40 साल पहले, भारत का झंडा फहराने वाली वे पहली भारतीय बनी। अधिकतम समय उन्होंने भारत से बाहर ही बिताया लेकिन उन्हें आज भी 'भारतीय क्रांति की जननी'…

इन्होंने पिछड़े वर्ग व महिलाओं की शिक्षा के लिए काम किया, लेकिन अधिकतर लोग इन्हें भूल चुके हैं। इन्होंने आधुनिक भारत के सबसे बड़े शिक्षा आंदोलनों में से एक को, फलने-फूलने की ज़मीन दी, लेकिन आज लोगों को उनका नाम भी नहीं पता। इन्हें भारत की पहली मुस्लिम महिला अध्यापिका…

संघर्ष में हम सभी हैं; ज़िंदगी युद्ध तो है ही। दूसरे को क्या दिखाना चाहते हो? अपनी चोट, अपनी हार या अपना हौसला? अपना हौसला दिखाओ न दूसरे को!
बचना ऐसे लोगों से जो बार-बार तुम्हें अपनी चोट और अपने घाव दिखाते हों। उसके पास जाना जिसके पास चोट भी…

अभी एक पिक्चर देखी ‘छिछोरे’, आईआईटी बॉम्बे पर आधारित है वो। कैंपस में चालीस लड़कों पर एक लड़की है। लेकिन वो जो लड़की है उसका कहानी में जो कुल योगदान है वो यही है कि वो सुंदर-सुंदर है और सब लड़के उसके पीछे पड़े हैं।
तो पूरी कहानी में लड़कों…

स्त्री चूँकि गर्भ रखती है तो प्रकृति ने ही उसे शरीर के प्रति बड़ा संवेदनशील बना दिया है। वो बार-बार अपने शरीर को देखती रहती है क्योंकि उसको एक बहुत महीन काम करना है, डेलिकेट काम; उस काम में अगर ज़रा भी गड़बड़ हो गई, इंफेक्शन हो सकता है, कुछ…

औरतों से मुझे जितनी शिक़ायत है, उतना ही उनको लेकर के दुःख भी है। उनको देखता हूँ, बहुत दुःख लगता है। और शिक़ायत इस बात की है कि वो अपने दुःख का कारण स्वयं हैं। भावना को वो अपना हथियार समझती हैं। देह को वो अपनी पूंजी समझती हैं। देह…

एक साधारण-सी दिखने वाली लड़की हो, स्कूल में या कॉलेज में वो जब पढ़ाई करेगी, ऊँचा स्थान लाएगी, या खेलों में जीतकर दिखाएगी या किसी और क्षेत्र में अपना हुनर दिखाएगी, उसको तब जाकर के कुछ ध्यान, कुछ अटेंशन मिलेगा। और जो सुंदर लड़की होगी वो कुछ नहीं, वो एक…

हिंदुस्तान में अभी भी दो जगह हैं जहाँ पर लडकियाँ बहुत कम पायी जाती हैं – लड़कियाँ, स्त्रियाँ सब – एक, श्मशान घाट, दूसरा, सत्संग। दोनों ही जगहों पर सच दिख जाता है न, और दोनों ही जगहों पर देह की नश्वरता दिख जाती है न। समाज नहीं चाहता है…

जब तुम अपने-आप को बेरोज़गार कहना शुरू कर देते हो, आंतरिक पतन होने लगता है। और वैसे ही पतन होने लगता है उन गृहणियों का जिनके ऊपर अब गृहस्थी की कोई खास ज़िम्मेदारी नहीं है, फिर भी वह घर पर ही बैठी हुई हैं।
मैं समझ सकता हूँ आप काम…

लड़की होगी वो चाहे गुड़गाँव में काम कर रही हो, चाहे बंबई में, चाहे बेंगलुरु में, उसकी दो ज़िंदगियाँ होती हैं। एक जो दफ्तर में होती है, दफ्तर में हो सकता है मैनेजर हो, पंद्रह लोग उसको रिपोर्ट करते हों, पंद्रह लोग उसके अधीनस्थ हों। और वहाँ पर वो एक…

सागर पार करके लंका पहुँचने हेतु पुल बन रहा था। उसमें यह सब वानर, भालू सब लगे हुए थे, हनुमान तो थे ही, इंजीनियर थे नल-नील, यह सब। और वहाँ एक फुदकी गिलहरी, वो भी लगी हुई है साथ में पूँछ उठाए। वह क्या कर रही है? वह बालू के…

पैसा ख़ुद कमाना पड़ता है न तो ज़िम्मेदारी अपने-आप आ जाती है। अधिकांश मामलों में जहाँ पर आज हम महिला को शोषक के तौर पर देख रहे हैं, वहाँ बात यह है कि ख़ुद वो कमा नहीं रही है।
पैसा कमाने बाहर अगर निकलो, सड़क पर जाओ तो आटे-दाल का…

बिलकुल तयशुदा कहानी है, उसमें कोई बड़े उतार-चढ़ाव नहीं हैं। उस कहानी में आता है – थोड़ी बहुत पढ़ाई, सात फेरे, मेटरनिटी वार्ड, दूध की बोतलें, दुनिया की देखा-देखी घर को फर्नीचर से भरना, कर्ज़ लेकर के मकान खरीदना, रोज़ आइने में देखना कि उम्र बढ़ रही है, और…

जिसके हाथ में ताक़त नहीं, वो बस उपभोग की वस्तु होगा। आदमी कहाँ से निकला है? जंगल से। और जंगल में प्रेम नहीं होता। जंगल में शिकारी होता है, और शिकार होता है। या जंगल में हीर-राँझा होता है? जो बाहुबल में ऊँचा हो वो क्या हो जाएगा? शिकारी। जो…

तुम्हारा बस काम क्या है? तुम बस कह दो कि, “तू मुझे अधिक-से-अधिक यह दिखा सकता है न हो कि मैं कितना गिरा हुआ हूँ, कितना गिरा हुआ हूँ, कितना गिरा हुआ हूँ मैं मान लूँगा। पर मैं काम करता रहूँगा, मैं जितना भी गिरा हुआ हूँ वहाँ से मैं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपका हमारे लिए क्या संदेश है?
आचार्य प्रशांत: (प्रेमपूर्वक हँसते हुए) मुझे ही ले चलो, मैं ही संदेश हूँ!
मज़ाक नहीं, मैं ही संदेश हूँ भाई! क्या संदेश दूँगा! जो भी संदेश दूँगा शाब्दिक होगा, तो अधूरा होगा। जैसे जी रहा हूँ देख लो, वही संदेश है।…

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत || १, ४० ||
कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, श्लोक ४०
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते…

आचार्य प्रशांत: ज्ञान बिना भक्ति असंभव है। जो ये सोचे कि ज्ञान नहीं होगा, समझेंगे नहीं, बोध नहीं होगा पर भक्त बन जाएँगे, वो आत्मप्रवंचना में है, *सेल्फ-डिसेप्शन*। उसकी भक्ति फिर ऐसी ही होगी, कैसी वाली? (आँखें बंद करके भजन करने का अभिनय करते हुए) ये वाली भक्ति होगी।
असली…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल के वीडियो "मौत के राज़" में आपने बताया कि अहम्-वृत्ति की मूल चाह मुक्ति है, पर अन्य जो आपके विडिओज़ हैं उनमें हमें ये सुनने को मिला है कि प्रकृति तो मुक्ति की राह में बाधा होती है, उसकी डिज़ायर (इच्छा) सस्टेनेन्स (बचे रहने) और प्रोक्रिएशन…

प्रश्नकर्ता: सादर प्रणाम, मेरा प्रश्न ये है कि सब कुछ जानने के बावजूद भी हम अंजान क्यों बने रहते हैं या यूँ कहें कि कोई ऐसी शक्ति है जो हमे अंजान बने रहने के लिए बाध्य करती है? ऐसा क्यों होता है आचार्य जी, मुझे समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: सब कुछ…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं एक गृहणी हूँ। परिवार में पति है, एक चार साल का बच्चा है और मम्मी-पापा हैं। तो उनके कामों में मेरा पूरा दिन निकल जाता है। मम्मी-पापा बुज़ुर्ग हैं, बीमार भी हैं, बच्चा छोटा है, पति भी है। मैं अपनी लाइफ (जीवन) में गवर्नमेंट जॉब (सरकारी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बच्चों को आध्यात्मिक शिक्षा कैसे दें? अभी जैसे अध्यात्म बेस (आधार) पर चल रहा है कि बुनियाद होनी चाहिए। अब मेरा बुनियाद तो नहीं है अध्यात्म और बच्चे पैदा हो गए ऐसे ही। तो उनका भी बेस (बुनियाद) नहीं हो पाएगा। जब मैं ही कोई बात नहीं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल एक रिकोर्डिंग देखी जिसमें एक महिला एक शांत दिखने वाले और एक गरीब आदमी को सरेआम पीट रही थी। कोई बीच-बचाव करने नहीं आया और शायद पुलिस भी उस आदमी को ही फँसा रही है। मेरे पुराने घाव उघड़ आए क्योंकि मैं भी झूठे दहेज के…

आचार्य प्रशांत: मैं तो सब समाप्त करके सोने ही चला गया था, फिर एक, दो, तीन संदेश आने लगे कि "आचार्य जी, बहुत लोग आज के एक मुद्दे पर सवाल पूछ रहे हैं, कुछ बोलिए।" तो मैंने मुद्दा देखा और फिर उठकर आ गया हूँ बोलने।
मुद्दा क्या है?
मुद्दा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आप बताते हैं कि माँ की ममता नवजात बच्चे की सुरक्षा के लिए होती है और जानवरों में दिखता भी है कि जैसे-जैसे नवजात बच्चे बड़े होने लगते हैं माँ के भीतर से ममत्व खत्म होने लगता है लेकिन इंसान के साथ ऐसा नहीं दिखता। मेरी…

प्रश्नकर्ता: मैं घूमती-फिरती हूँ, टूरिज़्म (पयर्टन) करती हूँ, अच्छे कपड़ों और ज्वेलरी (गहने) का शौक है मुझे। शॉपिंग (खरीदारी) करती हूँ। मुझे इस बात पर शर्मसार क्यों होना चाहिए? मेरे हसबैंड (पति) का बड़ा बिज़नेस (व्यवसाय) है। पेंटिंग, ट्रैवलिंग, ब्लॉगिंग मेरी हॉबी है और फ़ेमिनिज़्म मेरी आईडियोलॉजी (विचारधारा)।…

प्रश्नकर्ता: मुझे ग्यारहवीं और बारहवीं में शिक्षकों द्वारा यह दबाव बनाया जाता था कि तुम केवल पाठ्यक्रम का ही पढ़ो पर मैं उन पर ध्यान ना देकर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी करता था। मुझे अच्छा कॉलेज भी मिल गया इस कारण। लेकिन अभी कॉलेज में मैं एक्स्ट्रा को-करिकुलर एक्टिविटी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल मैं एक मीटिंग में था और जो सज्जन मेरे सामने थे उन्होंने बात-बात में ऐसे ही, ज़रूरत नहीं थी, उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के जो दो मूल शब्द हैं — सकाम कर्म और निष्काम कर्म, उनका प्रयोग ऐसे ही कर दिया हवा में। मैं ये सोच रहा था…

प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते, परिवार से, दोस्तों से और मोटिवेशनल स्पीकर्स से बहुत सारी मोटिवेशनल पंक्तियाँ सुनी हैं जैसे कि थिंक बिग, बड़ा सोचो, हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती, नेवर गिव अप (कभी हार न मानो), विनर्स नेवर क्विट एंड क्विटर्स नेवर विन (जीतने वाले कभी खेल…

प्रश्नकर्ता: आज आपको सामने देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है। इस ख़ुशी के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। जैसे अर्जुन को साक्षात ईश्वर के दर्शन हुए थे वैसे मुझे भी लग रहा है। मैं आपके सामने झोली फैलाकर आई हूँ। मैं वह पाना चाहती हूँ जो आपके अंदर…

प्रश्नकर्ता: मेरे को अकेला रहना पसंद है। वहाँ पर एक खयाल आया कि हमने जो है अपने अकेलेपन को सिर्फ़ लोगों से जोड़ कर देख लिया है, कि अगर मैं इन लोगों के साथ नहीं रह रहा तो मैं अकेला हूँ । लेकिन, जैसे ही आज यहाँ पर आकर बैठा,…

आचार्य प्रशांत: ''टोसुई का सिरका'' अब कहानी ज़रा ध्यान से सुनो।
टोसुई एक ज़ेन गुरु थे, जिन्होंने आश्रम के पारम्परिक ढंग के जीवन को त्याग दिया था और एक पुल के नीचे भिखारियों के साथ जीवन यापन शुरू कर दिया था। जब वे बूढ़े हो रहे थे तो उनके एक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी के चरणों में कोटि–कोटि नमन। गुरुजी, मैं एक अध्यापक हूँ और बच्चों को शिक्षित करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। अक्सर मेरे समक्ष कुछ ऐसे शिष्य भी आ जाते हैं जो आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर होते हैं, तो उनसे बिना कोई फ़ीस इत्यादि लिए मैं उन्हें…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जब गुरु के साथ होता हूँ तो सामान्यतः कोई सवाल नहीं होते हैं और विचार सुनने की स्थिति रहती है। लेकिन जैसे ही अलग होता हूँ तो दिमाग में कई सवाल आते-जाते रहते हैं। तो गुरु की उपस्तिथि या अनुपस्तिथि में एक ऐसी स्थिति कैसे बन…

आचार्य प्रशांत: प्रश्न है, "क्या वेदादि शास्त्रों के स्वाध्याय उपरांत उन पर आचरण करने के बाद भी किसी गुरु की, जीवन की उन्नति या मोक्ष की प्राप्ति हेतु आवश्यकता है?"
शास्त्र यूँ ही नहीं पढ़े जाते, शास्त्र पहले पात्रता माँगते हैं और पात्रता परीक्षा होती है। शास्त्र कहते हैं, "दिखाओ,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। यूट्यूब है, और यूट्यूब पर कितनी ही कोशिश करें, कितने ही वक्ता, प्रवक्ता, कथावाचक, मोटिवेशनल स्पीकर्स सामने पड़ ही जाते हैं। कई सारे लोग हैं जो 'जीवन में काबिल कैसे बनें', 'सफल कैसे बनें' इन सब विषयों पर बहुत बाते करते हैं। उनको सुनकर लगता है…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जैसे एक साधक होता है, तो वो शिक्षक कब जा कर बन जाता है?
मैं फेसबुक, इंस्टाग्राम और दूसरी जगहों पर भी देखता रहता हूँ। जैसे ओशो संन्यास ही है; तो एक समय के बाद वो ज्ञान बाँटना शुरू कर देते हैं। तो ज्ञान किसे देना…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने आपके पॉज़िटिव थिंकिंग को लेकर काफी वीडिओज़ देखे हैं और हमेशा आप पॉज़िटिव थिंकिंग को लेकर आलोचनात्मक ही रहे हैं। ये बात मुझे समझ में भी आती है कि पॉज़िटिव थिंकिंग की जगह समझ ज़्यादा ज़रूरी है लेकिन मैंने अपने स्वयं के जीवन में देखा है…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी जब मैं आध्यात्मिकता के बारे में किसी और से बात कर रहा होता हूँ तो एक शानदार ऊर्जा शब्दों के माध्यम से बह रही होती है। मैं दो घण्टे लगातार बिना सोचे-समझे बोल रहा होता हूँ। लेकिन जब मैं खुद को प्रतिबिम्बित करता हूँ उन्हीं शब्दों पर,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, पिछले सत्र में आपने कहा था कि साहस की कमी है, तो मैंने ये रियलाइज़ करा कि मैं चीज़ों को छोड़ कर भाग जाता हूँ, उसका सामना नहीं करता हूँ। तो उसपर काम कर रहा हूँ। आपने दूसरी चीज़ भी बताई थी, संकल्प को लेकर के।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मोटिवेशन इतना क्यों चलता है? हर हफ्ते कोई नया वीडियो आ जाता है, जैसे, “आग लगा देंगे! आसमान गिरा देंगे!" बुकस्टोर्स में भी ऐसी ही किताबें बिक रही होती हैं। ये मोटिवेशन का चक्कर क्या है?
आचार्य प्रशांत: मोटिवेशन क्या है ये समझ लेंगे, पहले ये याद…