आचार्य प्रशांत: प्रश्न है, "क्या वेदादि शास्त्रों के स्वाध्याय उपरांत उन पर आचरण करने के बाद भी किसी गुरु की, जीवन की उन्नति या मोक्ष की प्राप्ति हेतु आवश्यकता है?"
शास्त्र यूँ ही नहीं पढ़े जाते, शास्त्र पहले पात्रता माँगते हैं और पात्रता परीक्षा होती है। शास्त्र कहते हैं, "दिखाओ, कितना वैराग्य है तुममें या अभी उलझे ही हुए हो संसार में? उलझे हुए हो संसार में तो हमारे पास मत आना।" शास्त्र कहते हैं, "सत्य तक पहुँचना है, सत्य तक पहुँचने के साधन भी हैं तुम्हारे पास? संयम है? शम है, दम है? श्रद्धा है? विवेक बताओ? कहाँ है तितिक्षा, कहाँ है उपरति? और दिखाओ कितनी मुमुक्षा है तुममें?" और जब तक तुमने इन पात्रताओं को नहीं साध लिया, शास्त्रों को छूना व्यर्थ ही नहीं, नुकसानदेह है। अब यदि पात्रता परीक्षा है तो परीक्षक कौन? जाँचेगा कौन तुमको? पता कैसे चलेगा तुमको कि वास्तव में तुममें विवेक है कि नहीं? तुम कहोगे, "हम स्वयं जाँच लेंगे", पर स्वयं जाँचना तो विवेक का काम है। जाँचने का अर्थ होता है कि जो जाँचने वाला है उसमें विवेक होना चाहिए और तुम जाँच ही यदि यही रहे हो कि विवेक है कि नहीं, तो जाँचने की पात्रता तो तुममें है नहीं अभी। नतीजा गड़बड़ आने की बड़ी सम्भावना है।
तुम स्वयं को प्रमाण-पत्र दे सकते हो कि, "हाँ, मुझमें पात्रता है", तुम स्वयंभू पंडित बन सकते हो कि, "हाँ, मैं जानता हूँ!" आवश्यक नहीं है कि जो तुमने स्वयं को प्रमाणित किया वो ग़लत ही हो पर इसकी संभावना बहुत ज़्यादा है। लाख में से कोई एक होगा जो अपने दम पर पात्रता निकाल पाएगा, बाकियों को तो सिर्फ पात्रता का धोखा हो जाएगा और कई तो ऐसे होंगे जो पात्रता की परवाह भी नहीं करेंगे। वो कहेंगे कि, "शास्त्र कहते होंगे कि जाओ पहले पात्रता अर्जित करो, फिर पहले अध्याय पर आना", वो कहेंगे, "हटाओ इस बात को, कौन इनकी शर्तों का पालन करे, हम तो सीधे देखना चाहते हैं कि तुम कह क्या रहे हो? हम सीधे देवमूर्ति तक पहुँचना चाहते हैं, कौन पहले स्नान करे, द्वार पर जूते भी कौन उतारे, हम जैसे हैं वैसे ही गर्भगृह में घुस जाना चाहते हैं।" और ऐसा बहुतों ने किया है और इसके बड़े घातक अंजाम हुए हैं।
दुनिया में देखिए, आज इतनी कलह धर्म के नाम पर ही है, वो क्यों है? वो इसीलिए है क्योंकि बहुत-बहुत-बहुत लोग हैं जिन्हें लगता है कि वो धर्मग्रथों के अनुसार चल रहे हैं। अब वो हिंसा करें, चाहे बेईमानी करें, तमाम तरह के अधर्म करें और कुकृत्य करें, पर उन्होंने अपने आप को अब हक़ दे दिया है और वो भी मानव प्रदत्त हक़ नहीं, दैवीय हक़। वो कहते हैं, "हम जो कर रहे हैं वो शास्त्र सम्मत है, शास्त्र यही बात तो बोल रहे हैं। हमारी किताबों में लिखा है कि उसको मारो, उससे भेदभाव करो, उसको दबा कर रखो, उसको हक़ मत दो, उससे दूर-दूर रहो।" ये लोग जो किताबों का वास्ता देकर के धरती पर नरक खड़ा कर रहे हैं, क्या इन्हें वास्तव में किताबों का कुछ पता है? ये वही लोग हैं जिन्हें, या तो झूठा गुरु मिल गया या तो जिन्होंने गुरु की आवश्यकता ही नहीं समझी।

