प्रश्नकर्ता: मेरे को अकेला रहना पसंद है। वहाँ पर एक खयाल आया कि हमने जो है अपने अकेलेपन को सिर्फ़ लोगों से जोड़ कर देख लिया है, कि अगर मैं इन लोगों के साथ नहीं रह रहा तो मैं अकेला हूँ । लेकिन, जैसे ही आज यहाँ पर आकर बैठा, सामने नदी की आवाज़ आ रही है, हवा चल रही है, चिड़ियों की आवाज़ आ रही है। तो मुझे ऐसा लगा कि मैं तो कभी अकेला हो ही नहीं सकता क्योंकि किसी भी समय हवा तो रहेगी मेरे पास अगर सब कुछ भी चला जाए, हवा तो रही, मैं तो अकेला कभी हो ही नहीं सकता इस हिसाब से तो। साँस लूँगा, हवा अंदर जाएगी, वो भी तो कोई और है। मैं तो अकेला कभी हो ही नहीं सकता इस हिसाब से तो।
आचार्य प्रशांत: साँस किसके अंदर जा रही है?
प्र: शरीर के अंदर जा रही है।
आचार्य: तो शरीर तो अकेला हो ही नहीं सकता। ठीक बात है।
प्र: ये तो मतलब अगर मैं कहूँ कि मेरे को अकेला रहना पसंद है, तो ये तो मैं सबसे बड़ा झूठ खुद से ही कह रहा हूँ।
आचार्य: उससे पहले तुम और बड़ा झूठ बोल चुके हो, कि तुम शरीर हो।
पहले खुद ही परिभाषित करते हो कि, "मैं शरीर हूँ और हवा मेरे साथ है", फ़िर कहते हो इससे सिद्ध होता है कि मैं कभी अकेला हो ही नहीं सकता। जो तुम्हारा


