Jesus stands for the Truth and Truth is omnipresent.
He is present here, and right now, in the hearts of those who love him.
Jesus is not a mere mortal. Jesus is the source of light; the root of all flowers and beauty. In one form, he disappears. In another,… read_more
Prarabdha refers to the sum total of (apparent)movements in time and space that have resulted in the (apparent) formation of the jiva – the human being, or any other being.Everything that the being appears to be is prarabdha. And prarabdha is all past.
So,– having 5 fingers is prarabdha… read_more
प्रेम कोमलता की बात है? नहीं, प्रेम के लिए तो लोहा चाहिए! “जो ज़रा मुलायम दिल के लोग होते हैं, प्रेम तो उनकी बात है।” – नहीं! जो ये कोमल और मुलायम होते हैं यह तो बचेंगे ही नहीं कहीं प्रेम में, एकदम नष्ट हो जाएँगे।
प्रेम उनके बूते की,… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अगर शांति के लिए कोई कर्तव्य या वादा तोड़ना पड़े, तो उससे क्या कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता?
आचार्य प्रशांत: शांति के लिए वादे रखने भी पड़ सकते हैं।
प्र: जैसे मैं भीष्म की बात कर रहा हूँ।
आचार्य: हाँ, ठीक है। शांति इतनी ऊँची चीज़ है कि… read_more
प्रश्नकर्ता: अन्याय को सहना कितना ग़लत है जब पता हो कि अन्याय हो रहा है और मजबूरी है कि आवाज़ नहीं उठा सकते?
आचार्य प्रशांत: 'न्याय' शब्द समझिएगा। 'न्याय' शब्द का अर्थ होता है, साधारण भाषा में, जिस चीज़ को जहाँ होना चाहिए, उसका वहीं होना। जो चीज़ जहाँ हो,… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आपके सान्निध्य में आने के बाद एक नए का जन्म हुआ है। मैं बदला हूँ। अब इस नई रोशनी में पहले जैसा मैंने जीवन जीया, उसके प्रति निष्पक्ष और बेपरवाह हो रहा हूँ। पुराने ढर्रे हल्के हैं, लेकिन कभी-कभी उनके प्रभाव में कुछ और हो जाता… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जीवित गुरु का क्या अर्थ है? संतजन जीवित गुरु को अधिक महत्व देते हैं, पर कभी-कभी ये भी कहते हैं कि ये हवाएँ, ये जल, ये पर्वत, ये जानवर, ये सब भी मेरे गुरु हैं। आप भी कहते हैं, “ये तुमने क्या कर दिया, तुमने मुझको… read_more
आचार्य प्रशांत: पंचतंत्र में एक कहानी आती है, छोटी-सी, सरल, साधारण, उसको आधार बनाकर प्रश्न पूछा है। कहानी है बंदर और मगरमच्छ की। कहानी कहती है कि एक जामुन के पेड़ पर नदी किनारे बंदर रहता था। बंदर को नाम भी दे दिया गया है, ‘रक्तमुख’। लाल-लाल मुँह था न,… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, देखने पर पाता हूँ कि सुख से गहरा लगाव है और फिर शायद इसी वजह से किसी विशिष्ट स्थिति का इंतज़ार करता रहता हूँ।
आचार्य प्रशांत: विशिष्ट स्थिति क्या है? सुख का इंतज़ार कर रहे होगे।
प्र: इस लगाव से कैसे उबर सकता हूँ?
आचार्य: उबरने की… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आप कहते हैं कि पंचतंत्र की सारी कहानियाँ स्वार्थ की हैं, तो हम स्वार्थ से ऊपर कैसे उठें? कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: ये जो अभी तुमने सवाल करा, ये काफ़ी है। स्वार्थ के अपने ना प्राण होते हैं, ना पाँव होते हैं, स्वार्थ तुम्हारे सहारे पर… read_more
प्रश्नकर्ता: पहले ‘मोगली’ का चरित्र हुआ करता था, इसका मतलब वो हम लोगों से बेहतर था?
आचार्य प्रशांत: ये पूरा शिविर तुम्हारे लिए सार्थक हो गया अगर ये ख़्याल तुम्हें उठा है। तुम भूल जाना चार दिन क्या हुआ, अगर इस एक बात को भी तुम अपने साथ रख सको।… read_more
आचार्य प्रशांत: बुद्धि अगर आध्यात्मिक नहीं है, अगर समर्पित नहीं है, तो उसे काट मार जाता है; वो चलती तो है, पर आत्मघाती दिशा में। ख़ूब चलती है बुद्धि, अपना ही नुकसान करने के लिए ख़ूब चलती है।
तुम मिलो किसी आदमी से जो अपना ही ख़ूब नुकसान किए जा… read_more
आचार्य प्रशांत: मैं आईआईटी में था, उन दिनों रैगिंग हुआ करती थी ज़बरदस्त। ये जो फ़स्ट यिअर (प्रथम वर्ष) के लड़के आएँ नए-नए, इनको नाम दिया जाता था 'फच्चा'; फ़स्ट यिअर का बच्चा यानी फच्चा। इनको डरा दिया जाए। रैगिंग का अर्थ ही यही था, उसके साथ दुर्व्यवहार हो रहा… read_more
आचार्य प्रशांत: कल हम बात कर रहे थे कि प्रकृति से तो परमात्मा भी छेड़खानी नहीं करता, तुम्हारी छोटी-सी बुद्धि उससे क्या छेड़खानी कर लेगी! क्यों उसके साथ दाँव खेलते हो?
आपने शक्कर की बात करी है। दो बीमारियाँ, मधुमेह और ओबेसिटी (मोटापा) पिछले सौ साल की हैं, पहले भी… read_more
तस्माच्च देवा बहुधा संप्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि । प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्ध सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥
tasmācca devā bahudhā saṃprasūtāḥ sādhyā manuṣyāḥ paśavo vayāṃsi prāṇāpānau vrīhiyavau tapaśca śraddha satyaṃ brahmacaryaṃ vidhiśca
And from Him have issued many gods, and demigods and men and beasts and birds, the main breath… read_more
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं अभी कानपुर में जिनके घर रुकी हूँ, उनका चार साल का एक लड़का है जिसके दोनों पैरों में एलर्जी और त्वचा की कुछ समस्याएँ हैं। काफ़ी इलाज के बावजूद भी उसे कोई लाभ नहीं मिल पाया है।
मैंने बच्चे की माँ को समझाया कि बच्चे… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे शक आता है या जलन उठती है तो हम घुटने टेक देते हैं, इन सब पर तो हमारा वश ही नहीं होता। घुटने टेकने की हमारी बहुत गंदी आदत है, तो उसे कैसे रोका जाए?
आचार्य: नहीं, घुटने टेकने तक भी ठीक है, उसके आगे के… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्र में आने से मेरी जो ग्रोथ (प्रगति) की डिटर्मिनेशन (दृढ़ संकल्प) होती है, वो कम हो जाती है। मुझे लगता है, सब सही तो है, तो क्यों ग्रोथ करना? लेकिन आज की दुनिया में ग्रोथ तो ज़रूरी है, ख़ासकर मैं जिस क्षेत्र से हूँ उसमें, और… read_more
प्रश्नकर्ता: मैं जब ग्रंथों, गुरुओं और बुद्धपुरुषों के पास जाता हूँ, तो मेरे मन में तत्काल श्रद्धा जग जाती है, मन एकदम से चिल्ला उठता है कि यही हैं सच्चे गुरु, पर बाद में यही एहसान-फ़रामोश मन संदेह करने लगता है।
आचार्य जी, मेरी मनोस्थिति आपके सामने है। कृपया मार्गदर्शन… read_more
प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपका एक सत्र देख रहा था, उसमें अपने बोला था कि आज के साधक को संसार से उतना ख़तरा नहीं है, जितना समकालीन, आज के गुरुओं से है। मेरे कुछ दोस्त भी कुछ समकालीन गुरुओं के पास जाते हैं। कृपा करके इस विषय पर थोड़ा और… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सादर प्रणाम। आप जानवरों की कथाएँ पढ़वा रहे हैं, और मेरी समस्या ये है कि मुझे तो छोटे-छोटे जीवों से भी डर लगता है। कैसे इनसे डरना बंद करूँ? क्या मुझमें शरीर बोध ज़्यादा है?
आचार्य प्रशांत: शुरुआत कर लो। जिससे प्यार हो जाता है, जिससे दिल… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कैसे पता करूँ कि अगर कोई मुझे कुछ समझा रहा है, तो वो मेरे लिए ठीक है या नहीं? कैसे पता करूँ कि मेरी ज़िंदगी अंधेरे की तरफ़ बढ़ रही है, या रोशनी की तरफ़?
आचार्य प्रशांत: बात सीधी है। नज़र साफ़ होने लगी हो, बेहतर दिखाई… read_more
आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा आई है, पंचतंत्र की एक कहानी है, उसको आधार करके प्रश्न भेजा है। कहानी मैं पहले सुना देता हूँ।
कहानी है कि एक जुलाहे को एक राजकुमारी के रूप से आसक्ति हो जाती है। वो जानता है, राजकुमारी है, उस तक उसके हाथ पहुँच नहीं सकते, तो… read_more
प्रश्नकर्ता: नमन, आचार्य जी। मुझे समस्या आती है वैराग्य को अपने पारिवारिक जीवन के साथ जीने में। जैसे भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य ने ज्ञानी होकर भी कुछ ग़लत निर्णय लिये, वैसे ही मैं भी स्वार्थी और असमर्थ हो जाता हूँ परिवार के सामने। परिवार के सामने सारा ज्ञान विलुप्त हो… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मुझे कई बार अजीब-सी स्थिति अनुभव होती है, उस समय मन में कोई हलचल या बेचैनी इत्यादि नहीं होती है, साँस भी तब बहुत स्थिर और लयबद्ध हो जाती है, दिल की धड़कनें स्पष्ट अनुभव होती हैं और उस समय बस पड़े रहना अच्छा लगता है।… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने कहा था कि पहले अपने सारे ऋण चुका लो, फिर मेरे पास आना। पर ऋण चुकाने के प्रयास में मैं सांसारिक चीज़ों में उलझ करके समय व्यतीत कर रहा हूँ। परिस्थितियाँ मेरी बड़ी जटिल हैं, मेरे भीतर एक चिड़चिड़ापन है। मैं इस चक्रव्यूह से कैसे निजात… read_more
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। यह सवाल मुझे बहुत परेशान करता है कि अगर चेतना ख़ुद को नहीं देख सकती, तो जानने वालों ने किसको जाना? कहते हैं कि सत्य को जाना नहीं जा सकता, शून्यता को ही परमसत्य कहा गया है। वहाँ ना कोई बोलने वाला है, ना कोई सुनने… read_more
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है तथा अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं का सृजन करता हूँ अर्थात् जन्म लेता हूँ।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ७
प्रश्नकर्ता: वह धर्म ही क्या जिसे किसी की रक्षा की… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कर्ण जैसी ही भावनाएँ मेरे मन में भी चलती रहती हैं, लगता है कि अर्जुन से ऊपर चले जाएँ, अर्जुन बन जाएँ, अर्जुन से जीत जाएँ। इस हालत में श्रीकृष्ण जैसे सारथी या मित्र की ज़रूरत महसूस होती है, लेकिन मिल जाते हैं शल्य या दुर्योधन… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब कोई बुरी घटना होती है, जैसे कि किसी की मौत, तो फिर उससे सम्बंधित विचार मुझे बार-बार सताता रहता है, रात को नींद भी नहीं आती है। उसे कैसे भूल सकते हैं, और वो क्यों आते हैं?
आचार्य प्रशांत: बेटा, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ग़ुलामी क्या है? और ग़ुलामी में ही जीना अच्छा है, कि अपनी मर्ज़ी से जीना भी अच्छा है?
आचार्य प्रशांत: एक तो वो ग़ुलामी है जिससे तुम परिचित ही हो। वो ग़ुलामी है कि जब कोई दूसरा तुम पर दबाव बनाए इत्यादि। अभी उस दिन तुम कह… read_more
प्रश्नकर्ता: जब मेरा बुरा वक़्त था, तो मेरे साथ किसी ने बहुत अभद्र व्यवहार किया और मेरी तकलीफ़ बढ़ाई। और आज भी जब मेरी ज़िंदगी आगे बढ़ रही है, तो वह मुझे अप्रत्यक्ष रूप से ताना मार रहा है। दूसरों के सामने वह स्वयं को बहुत अच्छा दर्शाता है और… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बेफ़िक्री और कामचोरी में क्या अंतर है? आपके सानिध्य के साथ बेफ़िक्री बढ़ी है, पर ऐसा लगता है कि कहीं कामचोरी भी तो नहीं बढ़ रही। कृपया स्पष्टता प्रदान करें।
आचार्य प्रशांत: जब सही काम चुन लिया जाता है तो मूर्खताओं को, दुनिया भर के तमाम झंझटों… read_more
प्रश्नकर्ता: कुंती ने अपने पुत्र कर्ण को पैदा होते ही नदी में क्यों बहा दिया?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि हम सब बड़े डरपोक लोग होते हैं, प्यार भी करते हैं तो छुप-छुपकर। हमारा सब कुछ सामाजिक होता है; हमारा प्रेम भी सामाजिक होता है। वह समाज से अनुमोदन माँगता है। वह… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। पिछले सत्र में आपने ऐसी निर्ममता से चीर-फाड़ की कि मेरे सारे नक़ाब अस्त-व्यस्त हुए जा रहे हैं।
आज से दो साल पहले की बात है। मैंने किसी से पूछा, “यह अहंकार क्या होता है?” मुझे लगता था कि मुझमें तो अहंकार रत्ती भर भी नहीं… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आप कहते हैं कि जीवन सुधारो। जो अभी है जीवन में, मैं उसे छोड़ना चाहती हूँ, जैसे अहंकार, क्रोध इत्यादि। ये सब तो छूट ही नहीं रहा है। जब समझ में आता है कि अहंकार है, तो भी क्रोध आ जाता है किसी बात पर। जब… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने एक बार आपको कहते हुए सुना था कि, "तुम जो भी कुछ चुनोगे, ग़लत ही होगा", तो क्या सत्य का मार्ग चुनना भी ग़लत है? कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: सत्य चुना नहीं जाता। सत्य की जब कृपा होती है, तो तुम झूठ को नहीं चुनते। सत्य… read_more
प्रश्नकर्ता: गुरु द्रोण की स्थिति और विवशता को मैं अपने जीवन से जोड़कर देख रहा हूँ। वे जानते हैं कि सच क्या है, फिर भी व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति एवं अन्य लोभों के कारण कौरवों के साथ हैं। युद्ध के समय जब दुर्योधन बार-बार उन्हें जली-कटी सुनाकर उकसाता है तो… read_more
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। धृतराष्ट्र जब युद्ध में अपने पुत्रों की दुर्गति देखते हैं तो कहते हैं कि "काश! पांडवों को पाँच गाँव दे ही दिए जाते, पितामह और कृष्ण की बात मान ही ली जाती।" ऐसी ही स्थिति हमारी ही होती है जब हम अपने कर्मों का कुफल भुगतते… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। श्रीकृष्ण को अर्जुन से विशेष प्रेम था। अर्जुन के लिए श्रीकृष्ण ने भीष्म के विरुद्ध भी अस्त्र उठा लिये थे, तब जबकि उन्होंने युद्ध में अस्त्र न उठाने का वचन दिया था। सूर्य को सुदर्शन चक्र से छुपाकर कुछ देर के लिए सूर्यास्त जैसा वातावरण भी… read_more
प्रश्नकर्ता: दुर्योधन ने कर्ण को युद्ध में घसीटा था। क्या दुर्योधन कर्ता था जिसने कर्ण को युद्ध में घसीट लिया, क्या दुर्योधन केंद्रीय था? या फिर कर्ण की वजह से दुर्योधन युद्ध में गया था, कर्ण के भरोसे पर? तो क्या कर्ण केंद्रीय था?
आचार्य प्रशांत: सवाल समझ पा रहे… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, गुरु के प्रति कृतज्ञता अगर कम होने लगे तो क्या करना चाहिए? कृपया मार्गदर्शन करने की अनुकंपा करें।
आचार्य प्रशांत: अपनी ओर देख लेना चाहिए। गुरु के प्रति यदि कृतज्ञता अगर कम होने लगे तो अपनी हालत को देख लेना चाहिए। जैसे कोई ऊपर से लेकर नीचे… read_more
प्रश्नकर्ता: मन के विकार दिखते तो हैं कि झूठे हैं, पर मैं उनके प्रति हथियार नहीं उठा पाता। मेरे भीतर तो विकार, इच्छाएँ और डर भी सगे-संबंधी बनकर आते हैं।
आचार्य प्रशांत: क्या सेवा करूँ तुम्हारी? तुम्हारा युद्ध मैं लड़ूँ?
जब जान गए हो इतना कुछ, तो फिर अटक क्यों… read_more
प्रश्नकर्ता: परिवार में, नौकरी में, आदतों में, हर जगह मैं अर्जुन की तरह अपने-आपको दुविधाग्रस्त पाता हूँ। सत्य कई बार दिख भी रहा होता है, पर किसी मूर्खतावश उस पर चलने का साहस नहीं कर पाता। मेरी अपने भीतर बैठे कृष्ण तक पहुँच नहीं है, और आपकी कही युक्तियों पर… read_more
प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न है कि युद्ध के मैदान में अर्जुन अपनों को सामने पाकर मोहवश उदास होता है, कहता है कि, "मैं अपने सगे-संबंधियों को कैसे मार सकता हूँ! यह उचित नहीं।" तो श्रीकृष्ण उससे कहते हैं कि जब सिद्धांतों की लड़ाई होती है, तब केवल कर्तव्यों का ही ध्यान… read_more
प्रश्नकर्ता: प्रतिज्ञा क्या है? अधर्म का साथ क्यों दे दिया? क्या प्रतिज्ञा पर आबद्ध होना अहंकार है? इच्छामृत्यु क्या है?
आचार्य प्रशांत: अपनी दृष्टि में अधार्मिक कोई नहीं होता। अपनी दृष्टि में धार्मिक सब होते हैं, बस लोगों का धर्म व्यक्तिगत होता है, पूर्ण नहीं होता, निरपेक्ष नहीं होता, निर्वैयक्तिक… read_more