यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है तथा अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं का सृजन करता हूँ अर्थात् जन्म लेता हूँ।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ७
प्रश्नकर्ता: वह धर्म ही क्या जिसे किसी की रक्षा की आवश्यकता हो; सत्य तो स्वयंसिद्ध होता है। श्रीकृष्ण किस धर्म की रक्षा की बात कर रहे हैं?
बहुत सारे महात्मा लोग आज भी यह कहते हुए कि वेद अपौरुषेय हैं, क़ुरआन अल्लाह की किताब है, इसी बात को दिल-ओ-जान से लगाए बैठे हैं और जो उनकी बातों को नहीं मानता, उसके दुश्मन बन जाते हैं, दंगे-फ़साद करते हैं। उन्हें बस ये छोटी-सी किताब दिखायी देती है। इतना बड़ा जो विश्व-ब्रह्माण्ड है, उसमें उनको कुछ दिखायी नहीं देता। आचार्य जी, समझाने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: सत्य और धर्म में अंतर होता है। और इसको समझना, तुम कह रहे हो, "वो धर्म ही क्या जिसे रक्षा की आवश्यकता हो।" कृष्ण कह रहे हैं जब-जब धर्म की हानि होती है, अधर्म का बोल बाला चढ़ता है, तब-तब वो प्रकट होते हैं धर्म की रक्षा के लिए।
धर्म की हानि निःसंदेह हो सकती है। क्यों लग रहा है तुम्हें कि धर्म की हानि नहीं हो सकती? धर्म सत्य थोड़े ही है। सत्य किसी से संबंधित नहीं होता, सत्य स्वयंभू होता है, सत्य असम्बद्ध होता है। धर्म जीव के लिए होता है; जीव है तो धर्म है।


