प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्र में आने से मेरी जो ग्रोथ (प्रगति) की डिटर्मिनेशन (दृढ़ संकल्प) होती है, वो कम हो जाती है। मुझे लगता है, सब सही तो है, तो क्यों ग्रोथ करना? लेकिन आज की दुनिया में ग्रोथ तो ज़रूरी है, ख़ासकर मैं जिस क्षेत्र से हूँ उसमें, और वैसे भी। तो क्या करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: जिस तरह की ग्रोथ तुम चाह रहे हो, अध्यात्म में आने से अगर उस तरह की ग्रोथ के प्रति तुम्हारा रुझान कम हो जाता है, तो मतलब वो ग्रोथ, ग्रोथ है ही नहीं।
प्र: आलसी होने में और संतोषी होने में क्या अंतर है? कभी-कभी लगता है मुझे कि कोई चीज़ नहीं चाहिए, और कभी-कभी लगता है कि ये ज़रूरी भी है।
आचार्य: अगर मन को पूरा ही समझा लो कि नहीं चाहिए, और मन उपद्रव करना बंद ही कर दे, तो समझ लो कि संतुष्ट हुआ। और अगर मन बीच-बीच में फिर भी चूँ-चपड़ कर ही रहा है, तो फिर ये संतोष इत्यादि नहीं है, ये रजस और तमस की लड़ाई है।
तुम्हारे सवाल पर वापस आते हैं। तुम्हारे शरीर में कोई हड्डी बढ़ रही है, उसको ग्रोथ ही कहते हो न? देखिए, ग्रोथ हो रही है। अब चिकित्सक के पास जाते हो, वो दवाई देता है या सर्जरी (शल्यक्रिया) कर देता है तो तुम्हारी ग्रोथ कट जाती है। ये अच्छा हुआ, कि बुरा हुआ? तुम्हारे भीतर एक कैंसर (कर्क रोग) की गाँठ बढ़ रही है, वो भी तो एक ग्रोथ ही कहलाती है न? *कैंसरस ग्रोथ*। चिकित्सक के पास गए, उसने हटा दी, तो ये अच्छा हुआ, कि बुरा हुआ?


