आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा आई है, पंचतंत्र की एक कहानी है, उसको आधार करके प्रश्न भेजा है। कहानी मैं पहले सुना देता हूँ।
कहानी है कि एक जुलाहे को एक राजकुमारी के रूप से आसक्ति हो जाती है। वो जानता है, राजकुमारी है, उस तक उसके हाथ पहुँच नहीं सकते, तो निराश रहने लगता है। तो उसका एक दोस्त होता है। दोस्त कहता है, "मैं तरीका बता देता हूँ।"
तरीका लम्बा-चौड़ा है, संक्षेप में तरीका ये है कि जुलाहे को विष्णु का झूठा रूप देकर, विष्णु-सा ही वाहन तैयार करके, विष्णु जैसे ही अस्त्र, शंख इत्यादि दे करके राजकुमारी के पास भेज दिया जाता है, और तीर-तिकड़म से राजकुमारी को ये भरोसा दिला दिया जाता है कि वो जुलाहा नहीं है, विष्णु ही है। कहानी है।
तो राजकुमारी कहती है, "मेरे धन्यभाग! विष्णु पधारे। मैं आपकी क्या सेवा करूँ?"
जुलाहा कहता है, "अपना शरीर मुझे अर्पित कर दो।"
राजकुमारी मान जाती है। सामने विष्णु खड़े हैं, विष्णु का रूप, विष्णु जैसा आकर्षण, माधुर्य, तेज।
तो ये खेल चलता रहता है। एक दिन राजकुमारी ये सारा क़िस्सा राजा और रानी को बयाँ कर देती है। कहानी की बात! राजा और रानी को भी भरोसा आ जाता है कि वास्तव में विष्णु ही उनकी बेटी के पास आया करते हैं। तो राजा अपनी बेटी से कहता है कि "अब जब विष्णु ही हमारे संबंधी हो गए तो फिर तो हम पूरी दुनिया जीत सकते हैं।" तो राजा आसपास के पाँच-छह देशों से लड़ाई मोल ले लेता है—किस दम पर? इस बूते पर कि “मेरी बेटी के प्रेमी तो स्वयं विष्णु हैं। मुझे कौन हरा सकता है?”



