प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न है कि युद्ध के मैदान में अर्जुन अपनों को सामने पाकर मोहवश उदास होता है, कहता है कि, "मैं अपने सगे-संबंधियों को कैसे मार सकता हूँ! यह उचित नहीं।" तो श्रीकृष्ण उससे कहते हैं कि जब सिद्धांतों की लड़ाई होती है, तब केवल कर्तव्यों का ही ध्यान रखा जाता है। इस कथन को मुझे किस प्रकार समझना चाहिए, कृपया समझाने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: कृष्ण ने कभी ऐसा कुछ कहा ही नहीं तो मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ कि इस कथन का आशय क्या है? यह कहाँ से उठा लाए, बेटा?
गीता उपलब्ध है न, गीता को सीधे पढ़ो। गीतासार मत पढ़ा करो, गीता के अनुवाद मत पढ़ा करो, गीता पर जो टीका-टिप्पणी होती है, वो न पढ़ा करो। यह तो तुम जो महाभारत सार पढ़ रहे थे, उसमें गीता की चंद पंक्तियाँ लिखी हुई थीं, उसमें से तुम उठा लाए। गीता को महाभारत का हिस्सा ही भर मत मान लेना, गीता को चंद पंक्तियों भर में ही मत समझ लेना। बिलकुल भी नहीं कहा है यह कृष्ण ने, बल्कि कृष्ण की बात इसके बिलकुल ही विपरीत है।
तुम कह रहे हो, "जब सिद्धांतों की लड़ाई होती है, तब केवल कर्तव्यों का ही ध्यान रखा जाता है।" कृष्ण ने इसका बिलकुल विपरीत बोला है। कृष्ण तो कह रहे हैं कि कर्तव्य तो छोड़ो, तुम अपने सारे धर्मों को ही छोड़ दो – "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" तुम कह रहे हो कि कृष्ण कह रहे हैं कि कर्तव्यों का पालन करो, वो तो कह रहे हैं कि सब धर्मों का भी परित्याग कर दो। एक ही धर्म है – कृष्ण का अनुसरण, और कोई धर्म भी नहीं होता। तुम कर्तव्य के तल पर ले आए कृष्ण को?
ऐसे ही एक गीता को ले करके चलता है, उसमें तमाम पोस्टर रहते हैं – "जो हुआ सो अच्छा हुआ, जो हो रहा है सो अच्छा हो रहा है, जो होगा सो अच्छा होगा", और उसमें कृष्ण की तस्वीर चिपका दी जाती है। कृष्ण भी ताज्जुब करते होंगे, “ऐसा तो कभी बोला नहीं!” पोस्टर लेकिन धड़ल्ले से बिकता है।

