प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, देखने पर पाता हूँ कि सुख से गहरा लगाव है और फिर शायद इसी वजह से किसी विशिष्ट स्थिति का इंतज़ार करता रहता हूँ।
आचार्य प्रशांत: विशिष्ट स्थिति क्या है? सुख का इंतज़ार कर रहे होगे।
प्र: इस लगाव से कैसे उबर सकता हूँ?
आचार्य: उबरने की ज़रूरत नहीं है। सुख क्या है? दुःख तुम्हें सताता है तो तुम सुख माँगते हो। ठीक बोल रहा हूँ? सुख कब माँगते हो? जब दुःख सताता है तो सुख माँगते हो। कुछ ग़लत थोड़े ही कर रहे हो, कोई पाप थोड़े ही कर रहे हो सुख माँग करके। दुःख कोई अच्छी बात है क्या कि दुःख में जियो? तो तुम सुख माँग लेते हो।
अब एक काम करो तुम। तुम अगर सुख के ही ग्राहक हो तो बढ़िया वाला सुख माँगो। भाई, मान लो, तुम गुड़ के ग्राहक हो; कौन-सा गुड़ दूँ तुम्हें? जल्दी बोलो। एकदम सोने की तरह चमकता हुआ गुड़ आता है एक, ताज़ा, मुलायम, और एक गुड़ आता है काला, पुराना, और गन्ने की भी जो ज़रा अविकसित क़िस्में होती हैं उनका, और सस्ता भी होता है। बोलो, कौन-सा गुड़ चाहिए? सस्ता या महँगा, सोने जैसा गुड़? तुम भी सोने जैसा सुख माँगो।
सुख की माँग बुरी नहीं है, क्योंकि सुख अगर बुरा है तो क्या मैं ये कहूँ कि दुःख अच्छा है? नहीं, बाबा! वो सुख माँगो जो दुःख को पूरे तरीक़े से मिटा ही दे, जो दुःख की संभावना ख़त्म कर दे।


