प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने कहा था कि पहले अपने सारे ऋण चुका लो, फिर मेरे पास आना। पर ऋण चुकाने के प्रयास में मैं सांसारिक चीज़ों में उलझ करके समय व्यतीत कर रहा हूँ। परिस्थितियाँ मेरी बड़ी जटिल हैं, मेरे भीतर एक चिड़चिड़ापन है। मैं इस चक्रव्यूह से कैसे निजात पाऊँ? मुक्ति कैसे हो? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: ऋण लिया है तो कोई सम्पदा भी तैयार की होगी, कुछ माल भी तो तैयार किया होगा न। ऋण लिया माने पैसे आए, उन पैसों से कुछ ख़रीदा भी तो होगा। ऋण चुकाना तो तभी भारी पड़ेगा जब जो सम्पदा तैयार कर ली है, उससे बड़ा मोह हो गया हो। ऐसा तो किसी के पास नहीं होता कि उसके पास ऋण चुकाने लायक राशि न हो, बस उसने वो राशि फँसा रखी होती है। कहाँ? सम्पत्ति में। अचल सम्पत्ति हो गई होती है जो लिक्विडेट (परिसमाप्त) नहीं हो रही होती है, है न?
भाई, मान लीजिए कि आपने ऋण लिया और उस ऋण से आपने मकान खड़ा कर दिया है, और आपने और ऋण लिया और मकान खड़ा कर दिया; और ऋण लिया, उससे आपने कहीं दुकान खरीद ली; और ऋण लिया, उससे आपने सोना-चाँदी, गहना खरीद लिया है। अब ऋण बढ़ गया है, आप उसे चुका रहे हैं, पर वो चुकाया नहीं जा रहा। और आप कह रहे हैं, “मैं क्या करूँ? मैं बेबस हूँ।”
आप बेबस तो नहीं हैं। राह तो बहुत आसान है। ये सब कुछ जो ऋण ले करके खड़ा कर लिया है, जमा कर लिया है, ये आपकी सम्पत्ति ही तो है। इसी से ऋण चुका दो न। पर नहीं, हमारा इरादा ये रहता है कि ऋण से जो कुछ बना लिया, वो तो बना ही रहे। अगर ऋण से घर खड़ा कर लिया, ऋण से गाड़ी खड़ी कर ली, ऋण से दुकान खड़ी कर ली, व्यवसाय खड़ा कर लिया, गहने खड़े कर लिए, तो वो सब तो बचे रहें। वो सब बचे भी रहें और ऋण चुका भी दिया जाए। ये लालच है।
अरे! जितना ऋण बचा हो, वो अगर बहुत भारी पड़ता हो तो उतने की जायदाद बेच दो, भाई। काहे उसको गले से बाँधे फिरना? क्यों आवश्यक है एसेट्स (सम्पत्तियों) को बचाए रखना? और फिर जितना ऋण लिया था, उतना पूरा-का-पूरा तो अभी शेष नहीं होगा, बहुत कुछ तो चुका चुके होओगे। तो ऐसा भी नहीं है कि सब ज़मीन-जायदाद बेच देनी पड़ेगी ऋण उतारने के लिए।

