प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ग़ुलामी क्या है? और ग़ुलामी में ही जीना अच्छा है, कि अपनी मर्ज़ी से जीना भी अच्छा है?
आचार्य प्रशांत: एक तो वो ग़ुलामी है जिससे तुम परिचित ही हो। वो ग़ुलामी है कि जब कोई दूसरा तुम पर दबाव बनाए इत्यादि। अभी उस दिन तुम कह रहे थे कि जहाँ तुम काम करते हो, वहाँ पर माहौल ऐसा है।
प्र: घर पर भी इमोशनल (भावनात्मक) ग़ुलामी हो जाती है।
आचार्य: और घर पर भी माहौल ऐसा है। तो एक तो ये ग़ुलामी हुई कि कोई संबंधी है या कार्यालय में तुम्हारा कोई सीनियर है, वरिष्ठ है, अधीक्षक है, वो तुम पर हुक्म चला रहा है, तुम्हें तुम्हारे मन की नहीं करने दे रहा इत्यादि; एक तो ये ग़ुलामी है। इससे बड़ी जो ग़ुलामी है और इस छोटी ग़ुलामी के पीछे जो मूल ग़ुलामी है, मैं उसकी बात करता हूँ।
मूल ग़ुलामी होती है अपनी ग़ुलामी। मन जैविक और सामाजिक संस्कारों से लिप्त हो जाता है। जैविक संस्कार तो उसमें जन्म के समय ही होते हैं और समय के साथ उसके ऊपर बहुत सारे सामाजिक संस्कार भी चढ़ जाते हैं। सांसारिक संस्कार चढ़ गए, इधर-उधर से कुछ सुना, प्रभाव पड़ा और प्रभाव चढ़ गए। ज़्यादा बड़ी ग़ुलामी है जब मन इन संस्कारों का ग़ुलाम हो जाता है।
मन को ग़ुलाम होना चाहिए सत्य का, उसकी जगह जब मन संस्कारों का ग़ुलाम हो जाए, वृत्तियों का ग़ुलाम हो जाए, तो समझ लेना बहुत बड़ी ग़ुलामी हो गई। और जिसको ये बड़ी ग़ुलामी हो गई, उसे बहुत सारी छोटी-छोटी ग़ुलामियाँ झेलनी पड़ेंगी।

