आचार्य प्रशांत: कल हम बात कर रहे थे कि प्रकृति से तो परमात्मा भी छेड़खानी नहीं करता, तुम्हारी छोटी-सी बुद्धि उससे क्या छेड़खानी कर लेगी! क्यों उसके साथ दाँव खेलते हो?
आपने शक्कर की बात करी है। दो बीमारियाँ, मधुमेह और ओबेसिटी (मोटापा) पिछले सौ साल की हैं, पहले भी होती थीं, लेकिन बहुत कम। ये दोनों कहाँ से आई हैं? दोनों ही शक्कर से आई हैं। आज से सौ साल पहले तक शक्कर पकवान की तरह होती थी। शक्कर नियमित रूप से इस्तेमाल ही नहीं होती थी: कोई ख़ास मौका है, कोई ख़ास बात है तो थोड़ी शक्कर डाली गई। फिर हुई दनादन गन्ने की खेती, और नतीजा अब सामने है।
हमारा जो मस्तिष्क ही है, वो और ज़्यादा, और ज़्यादा प्लेज़र सीकिंग (सुख अभिलाषी) होता जा रहा है। यहाँ तक कि अब मुश्किल है कि आप किसी को बिना शक्कर का खाना खिला दें, बड़ा मुश्किल है! और कामना बोध की दुश्मन होती है। प्लेज़र सीकिंग जिसका मन है, उसको कुछ समझ में नहीं आएगा, समझाया नहीं जा सकता। वो जानवर नहीं है, वो जानवर से बदतर है, क्योंकि जानवर में कामना होती है पर जानवर की कामना पर एक प्राकृतिक अंकुश लगा होता है। शरीर इच्छा करता है जानवर का और जानवर का शरीर ही उसकी इच्छा को एक लगाम भी देता है। आप जानवर को अनंत इच्छा करता नहीं पाएँगे। उसकी थोड़ी इच्छा होती है, उसके बाद नहीं।
शेर का पेट भरा है, आप नहीं पाएँगे कि वो व्यर्थ ही हिरणों को दौड़ा रहा है। शेर का पेट भरा है, उसके सामने से हिरणों का दल गुज़र जाएगा, वो हिलेगा भी नहीं। आदमी का मस्तिष्क एक बार कामनापूरित हो गया, कामनाकेन्द्रित हो गया, प्लेज़र सीकिंग हो गया, उसके बाद उसे कुछ भी समझा पाना बहुत मुश्किल है। तो ये है हमारी हालत।
आत्मा का अनुसंधान होना तो बहुत दूर रहा, हम जानवरों से भी नीचे गिर गए, हम प्रकृति से भी नीचे गिर गए। एक जानवर जिसे कोई चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं, एक जानवर जिसे कोई डायटीशियन


