प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं अभी कानपुर में जिनके घर रुकी हूँ, उनका चार साल का एक लड़का है जिसके दोनों पैरों में एलर्जी और त्वचा की कुछ समस्याएँ हैं। काफ़ी इलाज के बावजूद भी उसे कोई लाभ नहीं मिल पाया है।
मैंने बच्चे की माँ को समझाया कि बच्चे को जो तकलीफ़ है, वो रक्त की शुद्धता और परिवार में मधुमेह के इतिहास की वजह से है, तो इसलिए उन्हें मीठे शर्करायुक्त उत्पादों, जंक फ़ूड इत्यादि बंद कर देना चाहिए। पर माँ ने फिर तर्क दिया कि अगर बच्चे बचपन में चॉकलेट, आइसक्रीम और जंक फ़ूड नहीं खाएँगे, तो कब खाएँगे।
यहाँ पर बच्चे को जो तकलीफ़ है, उसमें पहला कारण परिवार में मधुमेह का इतिहास है और दूसरा कारण माताजी की सोच है। मैं स्वयं एक डॉक्टर हूँ और पाया है कि पंचानवे प्रतिशत मामले केवल हमारी ग़लत मान्यताओं और सोच की वजह से हैं।
आपके सम्पर्क में आने के बाद अध्यात्म और स्वास्थ्य एक जैसे ही दिखने लगे हैं; दोनों की शुरुआत हमसे होती है। आचार्य जी, इस पर थोड़ा प्रकाश डालिए।
आचार्य प्रशांत: आदमी क्या है, ये समझना पड़ेगा। एक छोटी-सी कहानी से शुरुआत करते हैं। वो आदमी के मन और उसके शारीरिक स्वास्थ्य को लेकर है। ऐतिहासिक कहानी है; कहानी कम है, तथ्य ज़्यादा।
आदमी जंगल-जंगल भटकता था छोटे-छोटे समूहों में, बीस, पचास, सौ के कबीलों में। भटकता था, तमाम तरह के कंद-मूल, फल, पत्ते इकठ्ठा करता था, खाता था। जानवरों को भी मारता था, उन्हें भी खाता है। ये कृषि से पहले की बात है, आदमी ने अभी खेती शुरू नहीं करी थी। आदमी पंचानवे प्रतिशत मामलों में वैसे ही जी रहा था जैसे अन्य पशु जीते हैं।


