आचार्य प्रशांत: मैं आईआईटी में था, उन दिनों रैगिंग हुआ करती थी ज़बरदस्त। ये जो फ़स्ट यिअर (प्रथम वर्ष) के लड़के आएँ नए-नए, इनको नाम दिया जाता था 'फच्चा'; फ़स्ट यिअर का बच्चा यानी फच्चा। इनको डरा दिया जाए। रैगिंग का अर्थ ही यही था, उसके साथ दुर्व्यवहार हो रहा है, डराया जा रहा है, उसकी टाँग खींची जा रही है, तरीक़े-तरीक़े से उसको कोंचा जा रहा है। और रैगिंग चलती थी बमुश्किल पंद्रह दिन, एक महीने, उसके बाद एक चीज़ होती थी ‘फ्रेशर्स पार्टी’, और उस दिन माना जाता था कि अब रैगिंग का अंत हो गया।
कुछ बातें मैंने देखी थीं। ये जो लड़का था, फच्चा, प्रथा ये थी कि उसकी रैगिंग वही ले सकते हैं जो उसके हॉस्टल (छात्रावास) के लोग हैं, बाहर वाले नहीं ले सकते। प्रथा है। पर ये सबसे डरता था। ये हॉस्टल से बाहर निकल जाए, इंस्टीट्यूट (संस्थान) पहुँच जाए, वहाँ कोई भी इसके सामने पड़े, ये तुरंत उसके सामने सिर झुका दे। इसको हॉस्टल में ये सिखाया जाता था कि इसके तथाकथित सीनियर्स (वरिष्ठों) द्वारा—और ये सीनियर कौन है? सीनियर कोई नहीं है, वो अठारह साल का सेकंड यिअर (द्वितीय वर्ष) का लड़का है। वही बहुत बड़ा बादशाह हो गया, वही रैगिंग लेता था।
तो ये सीनियर सिखाया करें कि सीनियर जब भी सामने पड़ेगा तो सिर झुकाओगे, और कुछ दो-चार बातें बता दी जाती थीं। कभी बता दिया जाता था कि छाती पर हाथ रखकर सिर झुकाओगे, कहीं कुछ कर दिया जाता था, सीनियर के सामने मुस्कुराओगे नहीं, कहीं किसी जगह परम्परा चलती थी कि सिर पर हाथ रख लोगे जैसे ही सीनियर सामने आए। होता है न, कुछ भी। ऐसे ही होता था।


