प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कर्ण जैसी ही भावनाएँ मेरे मन में भी चलती रहती हैं, लगता है कि अर्जुन से ऊपर चले जाएँ, अर्जुन बन जाएँ, अर्जुन से जीत जाएँ। इस हालत में श्रीकृष्ण जैसे सारथी या मित्र की ज़रूरत महसूस होती है, लेकिन मिल जाते हैं शल्य या दुर्योधन जैसे लोग जिस कारण और पतन होता है। कृपया बचने का उपाय बताएँ।
आचार्य प्रशांत: उपाय यही है कि जब कृष्ण सामने आएँ तो उनकी सुनो। तुमने बड़ी गड़बड़ बात बोल दी, तुमने कह दिया कि "अरे! मैं तो कर्ण हूँ और मेरा दुर्भाग्य यह है कि मुझे शल्य मिल गए, मुझे दुर्योधन मिल गए; अर्जुन बड़ा सौभाग्यशाली था, उसको तो कृष्ण मिल गए।"
तो तुमने सारा दोष डाल दिया परिस्थितियों के ऊपर। तुमने कह दिया, "मैं हूँ कर्ण, और कर्ण है अभागा। कर्ण को कौन मिल गया? दुर्योधन मिल गए, शकुनि, शल्य। और अर्जुन में कोई ख़ास बात नहीं, संयोग की बात है कि उसको कृष्ण मिल गए। तो क्या करें?"
कृष्ण कर्ण के पास नहीं आए थे क्या?
प्र: आए थे।
आचार्य: आए थे, समझाया था, सारी बातें बताई थीं, आमंत्रण दिया था। हाथ पकड़कर बोले थे, “चलो, तुम मानते काहे नहीं?”
अगर कर्ण हो तुम, तो तुमसे पूछ रहा हूँ, “तुम मानते काहे नहीं?” कृष्ण अर्जुन के पास जैसे गए थे, वैसे ही कृष्ण तो कर्ण के पास भी गए थे। वास्तव में अर्जुन को गीताज्ञान देने से पहले ही कृष्ण कर्ण को समझाने चले गए थे।

