प्रश्नकर्ता: मन के विकार दिखते तो हैं कि झूठे हैं, पर मैं उनके प्रति हथियार नहीं उठा पाता। मेरे भीतर तो विकार, इच्छाएँ और डर भी सगे-संबंधी बनकर आते हैं।
आचार्य प्रशांत: क्या सेवा करूँ तुम्हारी? तुम्हारा युद्ध मैं लड़ूँ?
जब जान गए हो इतना कुछ, तो फिर अटक क्यों रहे हो? देर किस बात की है? या इरादा बस शिकायत करने का है? जैसे नुक्कड़ पर चर्चा होती है, या गाँव इत्यादि में चले जाओ तो वहाँ पर घर के बाहर खाट और हुक्का चलता है। पूरे ज़माने की ख़बर ली जाती है। “ओबामा पुतिन से नहीं डरता था, ट्रंपवा डरता है।”
कुछ करना है? सही जीवन जीना है, या बस वाक-जाल फैलाना है, समेटना है, फैलाना है फिर समेटना है?
देखो कि क्या कर रहे हो तुम। कुल बात तुमने यह की है कि “मन में विकार उठते हैं, वृत्तियाँ हैं, राग-द्वेष हैं, भय है, और मैं जानता हूँ कि वह सब गड़बड़ है मामला, पर वो सब मुझे बड़े प्यारे लगते हैं, सगे-संबंधियों जैसे लगते हैं।”
तो क्या करें?
और क्या जवाब दोगे तुम ऐसे आदमी को जिसको तुम बता दो कि यह ज़हर है, और वो कहे कि, "मुझे बड़ा प्यारा लगता है"?

