प्रश्नकर्ता: कुंती ने अपने पुत्र कर्ण को पैदा होते ही नदी में क्यों बहा दिया?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि हम सब बड़े डरपोक लोग होते हैं, प्यार भी करते हैं तो छुप-छुपकर। हमारा सब कुछ सामाजिक होता है; हमारा प्रेम भी सामाजिक होता है। वह समाज से अनुमोदन माँगता है। वह समाज से कहता है कि, "स्वीकार कर लो न, मान्यता दे दो न।" और समाज से ना मिले स्वीकृति और मान्यता तो डर जाता है, छुपा देता है।
हम सब कुंती ही जैसे हैं। समाज के डर के मारे न जाने क्या-क्या छुपाए हुए हैं। कुंती ने कर्ण को छुपाया, तुमने भी तो न जाने कितने कर्ण छुपा रखे हैं, कि नहीं? न छुपाया होता कर्ण को तो न होती महाभारत।
मत पूछो कि कुंती ने कर्ण को क्यों बहा दिया, तुम बताओ कि तुम क्या-क्या छुपाए बैठे हो। हम सब कुंती हैं।
प्र२: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा यह प्रश्न है कि क्या हम भविष्य में होने वाली घटनाओं को जान सकते हैं ताकि हम पहले से ही उन घटनाओं के परिणाम से बच सकें? क्या सावधानी रखनी चाहिए?
आचार्य: यह ऐसा ही है कि जैसे कोई गाड़ी चला रहा हो और पता करना चाहे कि बीस किलोमीटर आगे कौन-सा गड्ढा है। तुम यह तो देख लो कि सामने कौन-सा गड्ढा है। भविष्य की घटनाओं की क्यों बात करते हो? ख़तरे क्या भविष्य में छुपे हुए हैं?
जैसे कि अभी तुम बिलकुल सुरक्षित हो। जैसे कोई गले में साँप लटकाए हुए हो, घातक विषैला कोबरा, और सवाल पूछ रहा हो, "कोई मुझे बताएगा क्या कि आज से पाँच साल बाद मेरे ऊपर कौन-सी विपत्ति आने वाली है?"

